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सच में ही समय ठहरता नहीं, अपनी निर्बाध गति से निरन्तर चलता रहता है। देखते ही देखते एक वर्ष गुजर गया, कल ही की बात लग रही है। आज ही के दिन पिछली अक्षय तृतीया के दिन हमारे अंतरंग हमें छो‹ड कर परलोक गमन कर गये, जहाँ से आज तक कोई लौटकर नहीं आया। परलोक, स्वर्गलोक, नरकलोक, पितृलोक आदि ना जाने कितने लोक हैं। आज तक किसी ने नहीं देखा। अगर देखा भी है तो किसी ने आकर बताया नहीं कि वो लोक कैसा है? इस तरह के विषयों पर अक्सर उनसे खुलकर चर्चा होती थी। सन् १९९४ के अगस्त माह में उनसे पहली मुलाकात हुई। मैं उम्र में उनसे १५ वर्ष छोटा था, उनको भाईजी नाम से ही सब दिन संबोधन किया पर वे मेरे अभिन्न मित्रों में से एक थे। उनका सानिध्य गुरु रूप, पिता स्वरूप, ब‹डे भाई, मित्र हर रुप में एक अमिट यादगार सा बन कर रह गया। उनके साथ बिताये पलों को भूलना मुश्किल ही नहीं असंभव है। हर समय हँसता, मुस्कुराता और ठहाके मारता चेहरा आज भी आंँखों के सामने ज्यों का त्यों है।
    भाईजी एक सेल्फमेड व्यक्ति थे। जीवन के शुरुआती समय बहुत संघर्षमय रहा। राजस्थान चुरू जिले के एक छोटे से गाँव ‘मैनासरङ्क में उनका जन्म हुआ था। बाल्यकाल में ही पिता का देहान्त हो गया। खेती छो‹डकर आजीविका का कोई साधन नहीं था। माताजी बहुत साहसी और हिम्मतवाली महिला थीं। बिखरते परिवार की बागडोर माताजी ने बखूबी संभाली और उन विकट परिस्थितियों में भी भाईजी को १९६० के दशक में बी.ए. तक शिक्षा दिलवायीं। शिक्षा पूरी करते ही रतनग‹ढ में शिक्षक की नौकरी मिल गई। माताजी की वृद्धावस्था होने लगी और इसी बीच ब‹डे भाई का देहान्त हो गया। अब स्वयं के और ब‹डे भाई के पूरे परिवार की जिम्मेवारी भाईजी के कंधों पर थी। उन दिनों शिक्षकों को इतना कोई खास वेतन नहीं मिलता था कि वे दो-दो परिवारों की जरुरतों को पूरी कर सकें। आखिर बहुत सोच-विचार के बाद भाईजी ने नौकरी छो‹डकर असम की ओर रूख किया, पर गौहाटी में भी और कोई काम की तजबीज नहीं बैठी तो पुनः बतौर qहदी-संस्कृत शिक्षक के तौर पर नौकरी पर लग गये। इसी दौरान भाईजी की मुलाकात कलकत्ता के एक सेठजी से हो गयी। सेठजी की नजरों ने परख लिया की आदमी बहुत काम का है। बातचीत पक्की हो गयी और मास्टर की ५०० रु. की नौकरी छो‹डकर कलकत्ता सेठजी के यहाँ प्रति माह १००० रु. वेतन वाली नौकरी ज्वाइन कर ली। भाईजी की जैसे लॉटरी सी लग गयी। इनकी मेहनत, लगन और व्यवहार कुशलता देखकर सेठजी ने हाथीचेरा (उधारबंद) चाय बागान का प्रबंधक बना दिया। मेरे विचार से शायद ही कोई चाय बागान प्रबंधक होगा जिसने साईकिल से शिलचर आना-जाना किया होगा। भाईजी बताते थे कि कभी चायपत्ती लेकर गा‹डी आती थी तो गा‹डी में अन्यथा हाथीचेरा से शिलचर साईकिल से ही आता था। प्रबंध कुशलता के धनी सीधे सरल भाईजी ने सेठजी के कारोबार में दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करी लेकिन ऐवज में सेठजी की तरफ से कहने लायक कुछ नहीं किया गया। एक तो इनकी लालची प्रवृत्ति नहीं थी या समझ लें कि जो मिलता था, उसमें संतुष्ट थे। जबकि इनके साथ वालों को ५०-६० हजार तनख्वाह मिलती थी। १९९०-९१ में जब नौकरी छो‹डी तब इनका वेतन ५००० रुपया था। अपने हक की खाने वाले व्यक्ति ने पच्चीस वर्ष की नौकरी में पैसा नहीं पर इज्जत खूब कमायी। नौकरी के दौरान कभी परिवार का सुख नहीं भोगा, हमेशा अकेले ही रहें, कारण इस बीच माताजी चल बसी थीं और (गांव में भाभी जी ने दोनो परिवार संभाल रखे थे)।
    बागान की सर्विस छो‹डने के बाद स्वयं का व्यवसाय आरम्भ किया। पूँजी कम थी पर मार्केट में संपर्क अच्छे थे, गुडविल अच्छी थी इसलिए कारोबार में कोई विशेष कठिनाई का सामना नहीं करना प‹डा। इधर एक मात्र पुत्र प्रमोद को दिल्ली से एमबीए करवा दिया। प्रमोद जॉब भी करने लगा। पर एक आध साल में भाईजी बोले अब तो प्रमोद को नौकरी छु‹डवा कर मेरा कारोबार संभलवा देता हूँ, मैं और कितना करुँगा। बाद में ही संभालेगा तो फिर अभी से क्यों नहीं? अच्छा निर्णय था। प्रमोद के आने के बाद सामाजिक कार्यक्रमों में और अधिक सक्रिय रहने लगे। मेरा भी उनके यहाँ आना-जाना लगातार बना रहा। इसी बीच १९९८ में ‘वनबंधु परिषदङ्क की एकल विद्यालय योजना का शुभारम्भ हुआ। भाईजी को योजना का मुख्य प्रभारी बनाया गया। कार्यकर्ताओं में मुख्य थे श्री दिलीप जी (प्रेरणा भारती)। मैं भी इनके साथ गाँव-गाँव घूमा। बराकवैली के ऐसे-ऐसे गाँवों में गये जहाँ जाना तो दूर की बात, नाम भी नहीं सुना। वैसे तो समाज के और भी कईयों का योगदान रहा है, पर विशेष तौर पर भाईजी और दिलीप जी ने एकल विद्यालय के लिए जो मेहनत की थी वो विशेष उल्लेखनीय है।
    समाजसेवा के साथ-साथ आप एक ओजस्वी वक्ता भी थे, कोई भी विषय पर आप धारा प्रवाह बोलने की क्षमता रखते थे। हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा के भी जबरदस्त वक्ता थे। मैंने एक दिन पूछ लिया भाई आप इतनी अच्छी अंग्रेजी कैसे बोल लेते हैं, आप तो हिन्दी माध्यम से प‹ढे लिखे हैं। तब वे बोले मैं बागान में था, तब रोजाना सुबह डिक्शनरी से दस मिqनग लिखकर पॉकेट में रख लेता और बार-बार याद करता। यही कारण है मेरी अच्छी अंग्रेजी का।
    आप एक आध्यात्मिक व्यक्ति थे, पर अंधविश्वासी बिल्कुल नहीं। शुरु शुरु में देखा कि पूजा-पाठ में ज्यादा समय नहीं देते थे, कहते थे भाई पेट तो काम करने से भरेगा, पूजापाठ से नहीं। लेकिन पिछले ५-४ साल से भगवान की भक्ति में लगे रहते थे। सामाजिक कामों में भी थो‹डे सुस्त हो गये थे, जबकि पहले आप बहुत सारी संस्थाओं से जु‹डे हुए थे। पूर्वोत्तर मारवा‹डी सम्मेलन, शिलचर शाखा के आप अध्यक्ष रह चुके थे। आपकी अध्यक्षता में मारवा‹डी समाज ने श्री गोपाल अखा‹डा में संकटमोचन हनुमान का भव्य मंदिर निर्माण हुआ। बराक हिन्दी साहित्य समिति के जन्मकाल से ही आप सक्रिय सदस्य रहें। पिछले हिन्दी दिवस पर आपको (मरणोपरान्त) सम्मानित किया गया। वैसे तो आप असम के महामहिम राज्यपाल द्वारा भी सम्मानित हो चुके हैं।
    वक्त गुजरता चला जायेगा, सिर्फ और सिर्फ यादें रहेंगी। कहते हैं संसार से जाने वाले को स्वयं को आभास हो जाता है पर ईश्वर की ऐसी माया है कि जाने वाला प्राणी स्पष्टरूप से कह नहीं पाता। इशारों-इशारों में जरुर दर्शा देता है पर हम लोग समझ नहीं पाते। मुझे क्षमा कर देना भाईजी, मैं उस दिन समझ ही नहीं पाया था कि ठीक एक दिन पहले आपने ऐसा क्यों पूछा था कि -‘‘यमदूत दिखते हैं क्या?ङ्कङ्क मैंने तो सदा की तरह ही आपकी बात मजाक समझी और सहज भाव में ही कह दिया था कि हाँ दुनिया से जाने वाले को दिखता है। और आप चुप हो गये थे। कुछ समय बाद आप बोले - ‘‘गले की रुद्राक्ष माला तो गुटू (प्रमोद) को दे दूँगा। ङ्कङ्क अब समझ में आया कि आपने तो हमें ईशारा कर दिया था ‘अलविदा दोस्तोंङ्क, हम ही अना‹डी नहीं समझ सके।
    तुम गये तो हर खुशी चली गयी,
    तुम्हारे बिना चिरागों में रोशनी चली गयी।
    क्या कहें, क्या गुजरी है, इस दिल पे,
    हम qजदा रह गये, पर हमारी जिन्दगी चली गयी।।