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हिन्दी का नाम आजकल हिन्दीभाषी क्षेत्र के राजनैतिकों के लिए एक कष्टदायक शब्द हो गया है।

जब भी उसका उल्लेख होता है वे सफाई देने के स्वर में बात करते पाए जाते हैं हम हिन्दी को हिन्दीतर प्रदेशों पर नहीं लाद रहे है, यह कहकर फिर वे दबी जबान में यह भी कह देते हैं कि हिन्दी को तब तक सारे भारत में लागू नहीं किया जाएगा जब तक qहदीतर प्रदेश के साथ फुसफुसाकर हिन्दीभाषियों से वे कहते हैं भाई, अभी बहुत हिन्दी-हिन्दी न करो। लगता है नेता और उसके प्रदेश के हिन्दीभाषियों के बीच किसी चालकी की संबंध बनाया जा रहा है-मेरी राष्ट्रीय छवि की रक्षा के लिए मेरे मुंह से हिन्दी का नाम न सुनाई प‹डना आवश्यक सिखाया था पर इस समय इस नाम जाप से मेरा अहित होगा। इसलिए तुम चुप हो जाओ। ऐसा कहकर नेता लोग हिन्दी के भविष्य के बारे में स्वयं भी चुप्पी साध लेते हैं। वास्तव में वे देश के भविष्य के बारे में चुप्पी साधे हुए हैं। देश का भविष्य ही हिन्दी के भविष्य को निर्धारित करेगा। अकेली हिन्दी का भविष्य देश के भविष्य के निर्धारित नहीं कर पाएगा। सभी भारतीय भाषाओं का भविष्य ही देश का भविष्य है राजनैतिक संस्थाओ ंके १९४७ से अब तक के केंद्रीकरण के साथ-साथ अंग्रेजी का केंद्र पर प्रभाव इतना गहरा हो चुका है कि केंद्र में अंग्रेजी लकी  जगह किसी भारतीय भाषा को देना केंद्रीकरण के पूरे यथार्थ को ही पलट देने पर संभव हो सकता है। हिन्दी के महंतों ने आज तक कभी इस यथार्थ को पलटने की न तो इच्छा दिखाई है न कोई प्रयत्न किया है। रूप में रखने पर सहमत हुए थे और अनुचरी के रूप में रखे जाने से संतुष्ट हो गए हैं। अंग्रेजी के साथ उनका हिन्दी को जो‹ड लेना केंद्रीकरण के फायदों में अन्य भाषाओं को धोखा देकर हिस्सा बांट  कर लेना ही था। यो कह सकते हैं कि जिस राष्ट्रीय एकता की तथाकथित रक्षा के हेतु हिन्दी के समर्थकों ने हिन्दी को राजभाषा बनाने के लिए हिन्दी को राजभाषा बनाने के लिए हिन्दी के विकास और तैयारी का वक्त मांगा वह दरअसल राष्ट्रीय एकता नहीं केंद्रीय शासन में साझेदारी नामक चीज थी। हिन्दी प्रदेश भी अपने यहां हिन्दी थी। हिन्दी प्रदेश भी अपने यहां हिन्दी राजभाषा नहीं बनाएंगे, यह अलिखित समझौता हिन्दी के विकास-कार्य के ठेकेदारों ने केंद्रीय सत्ता से किया था। यह समझौता न हुआ होता और १९४७ से १६६३ के बीच कभी अंग्रेजी हटाकर हिन्दी प्रदेशों ने हिन्दी को राजभाषा बना दिया होता तो आज राजनीति का नक्शा ही कुछ और होता। हिन्दी के विकास का भी वहीं एकमात्र रास्ता होता। विकास इसलिए कि जीवन के सब क्षेत्रों में हिन्दी के माध्यम से लिखने-प‹ढने बोलने की आवश्यकता ब‹ढती और इस्तेमाल ही विकास है, केंद्रीय हिन्दी निदेशालय के कक्षों में पारिभाषिक शब्दावली का अनुवाद विकास नहीं है। यह बात आज कुछ लोग बेमन से स्वीकार करने लगे हैं, qकतु यही बात जब आज से २० साल पहले कही गई थी तो हिन्दी के धुरंधर महारथियों ने विरोध में ब‹डा क्रोध प्रकट किया था। हिन्दी की बिडंबना यह है कि उसके मठाधीश असलियत को तब पहचानते हैं। जब चि‹िडयां खेत चुग गई होती है, किन्तु तब वे मानते हैं कि पछताने से ही कुछ होगा और अपने पछताने को भी भुना लेते हैं। अगर सचमूच उन्हें पछतावा है कि इतने बरस हिन्दी के विकास में करो‹डों रूपए खर्च करवा के भी वे हिन्दी को राजभाषा नहीं बना पाए तो अच्छा ही है, परंतु अब उन्हें यह पछतावा छो‹डकर आगे की ओर देखना चाहिए और समझना चाहिए कि इतिहास को बनाने में भाषा का क्या योग हो सकता है। आज केंद्रीयकरण को भारत की जनता एक बार अस्वीकार कर चुकी है। राजनैतिक सामाजिक संस्थाओं के निस्सत्व हो जाने की स्वाभाविक परिणति आंशिक तानाशाही को एक बार अस्वीकार कर देने के बाद भी नए सिरे से सामाजिक राजनैतिक संबंधों की रचना के लिए वह नेतृत्व सामने ला नही सकी है। नेतृत्व अब भी उन्ही के हाथ में है, जो केंद्रीकरण को सही मानते हैं और आज भी नहीं पहचान पा रहे हैं कि देश की एकता अंग्रेजी से नहीं हो सकती । इनकी इससे भी अधिकब‹डी भूल यह है कि राष्ट्रीय एकता को कए मुदा परिभाषा को पक‹डे बैठे हुए हैं। आज बिना तानाशाही किए किसी एक भाषा से देश की एकत संभव नहीं रह गई हैं। देश की सभी भाषाओं को अंग्रेजी ने इतना कमजोर कर दिया है कि जब तक वे एक बार एक-दूसरे से आदान-प्रदान करती हुई अपने प्रदेशों के लोगों के राजनैतिक अधिकारों को वापस न दिला दें तब तक देश में राष्ट्रीय एकता जैसी कोई चीज संभव भी नहीं होगी। आज सभी भाषाएं अपने-अपने प्रदेशों में अंग्रेजी के  नाम पर शासन करने वाले qहदीतर नेताओं के अरचनात्मक दिशाहीन, शोषणमूलक शासन शासन के नीचे दबी हुई है। आज हिन्दी दिवस के उपलक्ष में हिन्दी भाषी लोग इस यथार्थ क समझों तो हिन्दी दिवस भविष्योन्मुख हो सकेगा। अन्यथा वह प्रवंचना से भरे हुए एक अतीत की पूजा करने का अवसर बन कर ही रह जाएगा। हिन्दीभाषियों को समझना होगा कि उन्हें भारतीय भाषाणों के साथ साहित्य और कला के क्षेत्र में ही नहीं, राजनीति कि क्षेत्र में भी गहरा रिश्ता बनाना है। ऐसा रिश्ता बनाने में उन्हें अपनी संकीर्णता छो‹डने प‹डेगी। और यह केवल दिखावे के लिए नहीं। अच्छा होगा कि नई पी‹ढी में प्रत्येक हिन्दीभाषी कम-से कम एक नहीं तो दो भारतीय भाषाएं प‹ढें और उन्हीं के माध्यम से देश के अन्य नागरिकों से संपर्क करना सीखे। तब अंग्रेजी का संपर्क भाषा के रूप में प्रभुत्व  खंडित होगा और एक से अधिक भारतीय भाषाएं जानने से हिन्दी प्रदेश  के लोगों का अहंकार दूर होकर उन्हें आत्म-गौरव प्राप्त होगा। तभी हिन्दी के नेताओं को भी बगलें झांकने की मजबूरी से मुक्ति मिल सकेगी। (साभार पुर्वांचल प्रहरी)