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देशभर में हर्षोल्लास के साथ १४ qसतबर को हिन्दी दिवस मनाया जाएगा।

राष्ट्रभाषा व राजभाषा का दर्जा मिलने वाली हिन्दी के व्यापक प्रसार-प्रचार के उद्देश्य से हिन्दी दिवस मनाने की पंरपरा है। इस अवसर पर केंद्र सरकार के विभिन्न कार्यालय एवं सार्वजनिक उप्रकमों में आजकल हिन्दी पखवा‹डे का आयोजन किया जाता है। इसका एकमात्र मकसद हिन्दी की लोकप्रियता ब‹ढाना तथा इसके प्रचार-प्रसार मे अहम भूमिका निभाना है। स्वतंत्रता से पूर्व  राष्ट्रपिता महात्मा गया। भारतीय संविधान के भाग १७ की धारा ३४३ में संघ की राजभाषा हिन्दी बना दी गई और इसकी लिपि देवनागरी स्वीकार की गई। असम तथा पूर्वोत्तर भी हिन्दी के प्रसार-प्रचार के मामले में पीछे नहीं है। असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति हिन्दीतर क्षेत्रों की एक सक्रिय संस्थान है। इसको स्थापना असम के प्रथम मुख्यमत्री गोपीनाथ बरदलै ने स्वतंत्रता से पूर्व ही कर दी थी। गोपीनाथ बरदलै ने १९३८ में असम हिन्दी प्रचार समिति का गठन किया था, जिसका बाद में असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति नाम रखा गांधी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप मे अपनाने पर आवाज बुलंद की थी। सन १९१८ में हिन्दी साहित्य सम्मेलन में उन्होंने सार्वजनिक रूप से हिन्दी को ही राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाने का आग्रह किया था। आखिरकार आजादी के बाद सन १९४९ के १४ qसतबर को भारतीय संविधान सभा ने हिन्दी को ही भारत राष्ट्र की राष्ट्रभाषा बनने का निर्णय लिया। इस परिप्रेक्ष्य में १९५३ में संपूर्ण भारत में १९५३ के १४ qसतबर को पहली बार हिन्दी दिवस मनाया गया। इस संस्थान के बदौलत आज असम तथा पूर्वोत्तर में हिन्दी के प्रचार-प्रसार आशानुरूप हो रहा है। संस्थान ने मिली डिग्रियों को भी शिक्षा विभाग ने मान्यता दे रखी है। राज्य के प्रत्येक स्कूलों में हिन्दी विषय के अधिकांश शिक्षक इस संस्थान से ही डिग्री कर हिन्दी के प्रचार-प्रसार में योगदान देते आए हैं और दे रहे हैं। असम तथा पूर्वोत्तर के विभिन्न विश्वविद्यालयों में आज हिन्दी विभाग सक्रिय है। यहां हजारों शोधविद्यार्थी निकल चुके हैं, तथा जिन्होंने सैक‹डों महत्वपूर्ण शोध पत्र भी प्रकाशित किए हैं। यह पूर्वोत्तर के लिए गर्व की बात है कि देश की राष्ट्रभाषा या राजभाषा पर यहां काफी काम हो चुके हैं। और अनेक काम प्रगति पर है। लेकिन खेद की बात यह है कि असम तथा पूर्वोत्तर के प्रमुख शिक्षण संस्थान गुवाहाटी विश्वविद्यालय शोध पत्र अंग्रेजी में लिखना प‹डता है। दशको ंसे हिन्दी प्रेमी इसका विरोध करते आए हंै। लेकिन देश की राष्ट्रभाषा पर किए शोध पत्र हिन्दी में लिखने की करूण व्यथा सुनने के लिए कोई तैयार नहीं है। क्या यह राष्ट्रभाषा का अपमान या अवहेलना नहीं है। केंद्र सरकार देश में सरकारी कामकाजों में हिन्दी के अधिक से अधिक प्रयोग करने पर ब‹ढावा देती आ रही है। लेकिन राष्ट्रभाषा हिन्दी जैसी एक महत्वपूर्ण विषय के शोध पत्र विदेशी भाषा अंग्रेजी में लिखने की मजबूर करना कितना सही है, यह सबको ज्ञात है। इसी तरह असम में अनेक ऐसे व्यक्ति है, जिन्होंने निःस्वार्थ रूप से   हिन्दी को सेवा की। इन लोगों की मेहनत के बदौलत आज असम जैसे qहदीतर प्रदेश में लगभग सभी लोग कम से कम हिन्दी तो समझ लेते हैं। यहीं नहीं असम में ऐसे अनेक लोग हैं, जिन्होंने हिन्दी विषय पर अपना कैरियर बनाकर अच्छी-खासी जिन्दगी बिताई है।देश के दक्षिण भारत व पश्चिमों प्रांतो ंके अपेक्षा यहां के लोग अच्छी-खासी हिन्दी भी बोल लेते हैं। हमें इस मामले में व्यापक जनमत एकत्रित कर इसका पुरजोर से विरोध करना चाहिए। हम सभी जानते हैं कि पूर्वोत्तर के मुख्य द्वार के रूप में असम के राजधानी शहर गुवाहाटी को माना राजधानी शहर गुवाहाटी को माना जाता है। यहां पूर्वोत्तर के अनेक लोग आते-जाते हैं तथा निवास भी करते आए हैं। गौर करने की बात है कि अब यहां हिन्दी संपर्क भाषा के रूप में उभर आई है। पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में लोग हिन्दी समझते हैं, बोल लेते हैं। अगर आप हिन्दी चुकी है। सबसे ब‹डी बात यह है कि गुवाहाटी समेत पूर्वोत्तर के प्रमुख शहरों मे अगर किसी युवक को किसी होटल में काम करना है, तो उनके लिए हिन्दी बोल पाना अनिवार्य है। यही से यह स्पष्ट होता है कि हिन्दी की यहां लोकप्रियता के साथ कामकाजी जिन्दगी में भी अहमियत है। ऐसी स्थिति में देश के अन्य qहस्सों से असम तथा पूर्वोत्तर में किसी कारणवश आने वाले लोगों को यहां अपने भावों के आदान-प्रदान में कोई कठिनाइयों का सामना नहीं करना प‹डता है, जबकि दक्षिण भारत में हिन्दी तथा qहदीतर क्षेत्रों से गए लोगों को वहां के लोगों के साथ भावों के आदान प्रदान में कठिनाइयों का सामना करना प‹डा है। असम तथा पूर्वोत्तर में हिन्दी को अन्य भाषा के रूप में सीखी या सिखाई जाती है। राज्य के प्रत्येक विद्यालय में मातृभाषा के साथ साथ छठीं कक्षा से आठवीं कक्षा तक बोल पाते हैं, तो आपको असम, अरूणाचल प्रदेश, मणिपुर, नगालैंड, सिक्कम, मिजोरम, त्रिपुरा एवं मेघालय के किसी भी स्थान के दौरा करने में कोई कठिनाई नहीं होगी। पूर्वोतत्र में अंग्रेजी की अपेक्षा अधिकांश लोग हिन्दी या असमिया  बोल पाते हैं। टूटी-फूटी ही क्यों न हो, सभी लोग हिन्दी में समूचे पूर्वोत्तर में हिन्दी को संपर्क भाषा के रूप में अघोषित मान्यता मिल सभी बच्चों के लिए हिन्दी अनिवार्य विषय है। नवीं कक्षा से हिन्दी को ऐश्विक विषय के रूप में विद्यार्थी अध्ययन करते हैं। लेकिन राज्य के अनेक ऐसे स्कूल है, जहां अब हिन्दी शिक्षकों के अभाव में विद्यार्थियों को हिन्दी की उचित शिक्षा से वंचित रहना प‹ड रहा है। यदि सरकार की ओर इस मामले में ठोस कदम उठाए जाए, तो हिन्दी के प्रचार-प्रसार में यहां चार चांद लग जाएंगे।

(साभार पुर्वांचल प्रहरी)