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•दिलीप कुमार

मैं 1995 में असम के बराकघाटी के काछाड़ जिले के उधारबंद ग्राम में संघ के निर्देश से चाय बागान क्षेत्र में सेवा कार्य व धर्म जागरण के लिए आया। 2 साल उधारबंद, बड़खला, कालाइन व काठीघोड़ा एरिया में काम करके मैंने चाय जनगोष्ठी की पीड़ा महसूस की, जहाँ समस्याओं का अम्बार था। जीवन स्तर दयनीय और पिछड़ा हुआ है।

97 में मैं शिलचर आया, मैंने शिलचर कामर्स कालेज में हिन्दी अध्यापन व लॉ कालेज में विधि स्नातक की पढ़ाई शुरु की। मैंने शिलचर से पहली हिन्दी पुस्तक जो डीटीपी के द्वारा प्रकाशित हुई, ‘मेरी ललकार’ लिखी। बालार्क प्रकाशन से माननीय श्री अशोक वर्मा ने उसे प्रकाशित किया। सिद्धि विनायक सेवाश्रम के तत्वावधान में शिलचर में पहलीबार हिन्दी दिवस का उद्यापन किया गया। नरसिंह उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में आयोजित समारोह के सुत्राधार श्री अशोक वर्मा, श्री अजय यादव, श्री संतोष खण्डेलवाल थीं। संरक्षण स्वामी रामेश्‍वरानंदजी ने किया था। मैंने संचालन किया था। मैंने देखा कि बराकवैली में हजारो लोग हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा नहीं आती और हिन्दी-अंग्रेजी का कोई स्थानीय समाचार पत्र भी नहीं था। यहाँ के प्रमुख खबरों की चर्चा अगर उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, दिल्ली से आने वालों से होती तो वे बांग्ला पढ़ नहीं सकते थे। चाय बागाान, गांवबस्ती में रहने वाले हिन्दीभाषियों के पिछड़ेपन का प्रमुख कारण था शिक्षा। शिक्षा के लिए मातृभाषा का जागरण जरुरी था - ‘जिनको न निज भाषा तथा निज देश का अभिमान है, ये नर नहीं पशु निरा और मृतक समान है।’ 

अतः मैंने सबसे परामर्श किया और सर्वप्रथम ईटखोला में श्री कृपानारायण राय द्वारा निःशुल्क प्रदत्त एक कमरे में 1 फरवरी 1998 को बसंत पंचमी के दिन हिन्दी वाचनालय  का शुभारंभ किया और 8 फरवरी को बराक हिन्दी साहित्य समिति का गठन भी किया गया तथा ये निर्णय हुआ कि समिति के माध्यम से मैं मासिक प्रेरणा भारती प्रकाशन का कार्य चैत्र पूर्णिमा संवत् 2055 तद्नुसार 11 अप्रैल 1998 से प्रारंभ कर दुंगा। इस समय हमारे सहयोगी और परामर्शदाताओं में सर्वश्री अशोक वर्मा, स्व. अमरनाथ शर्मा, माननीय श्री अतीन दाश, सत्येन्द्र प्रसाद सिंह, अवधेश कुमार सिंह, चंद्रमा प्रसाद कोइरी, संतोष कुमार दे, त्रिवेणी प्रसाद चक्रवर्ती, स्व. लुनकरन जैन, सुनील कुमार सिंह, उमाकान्त  तिवारी, सुरेश चंद्र द्विवेदी, मदन सिंघल व कृपानारायण राय आदि शामिल थे।

बराक हिन्दी साहित्य समिति के प्रथम अध्यक्ष बने स्वामी रामेश्‍वरानंद जो लगभग साढ़े तीन माह तक दायित्व में रहे फिर श्री उदयशंकर गोस्वामी को अध्यक्ष बनाया गया, मुझे पहले दिन से ही महासचिव का दायित्व प्रदान किया गया। हमने समिति गठन के साथ ही काम भी शुरु कर दिया, असम विश्‍वविद्यालय में हिन्दी विभाग प्रारंभ करने के लिए एक प्रतिनिधिमंडल के साथ कुल सचिव से मिले। 15 मार्च को शिलचर में पहला होली मिलन समारोह आयोजित किया और लग गए प्रेरणा भारती के विमोचन की तैयारी में। इंडिया क्लब तारापुर चौराहे पर स्थित जया कंप्यूटर सेन्टर में डीटीपी का काम प्रारंभ हो गया। प्रथम अंक में ही प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के लेख व उनके जीवन परिचय से प्रथम पृष्ठ शोभायमान हुआ। पत्रिका आकार की 14 पृष्ठों की प्रेरणा भारती में स्व. अमरनाथ शर्मा, बाबुल नारायण कानु, मदन सिंघल, पुष्पा भारती, अशोक वर्मा, कपिलदेव उपाध्याय, संतोषी लोहार, दिलीप कुमार के लेख व कविताओं से अलंकृत हुआ। भारतीय नववर्ष कैलेन्डर, व्रत एवं त्यौहार, रामनवमी, तुलसी के गुण हनुमान चालीसा, लोक कथा , लेख, कविता व समाचारों से सजी-धजी प्रेरणा भारती का चैत्र पूर्णिमा तद्नुसार 11 अप्रैल 1998 को तारापुर हनुमान धाम में स्वामी रामेश्‍वरानंदजी के हाथों विमोचन हो गया।

प्रेरणा भारती के प्रथम अंक के कुछ पन्ने आपको स्कैन करके हम ज्यों का त्यों पढ़ने के लिए दे रहे हैं, इससे पता चलेगा कि आज जो कुछ हो रहा है, वह पहले ही हो जाना चाहिए था। प्रेरणा भारती का दूसरा, तीसरा व चौथा अंक शिलचर से ही प्रकाशित हुआ। चार अंक हमने राजेन्द्र नगर, पटना के डाटा कंप्यूटर सेन्टर से प्रकाशित कराया। पत्रिका के सम्पादक माननीय कृपा नारायण राय थे, लेकिन उनका निवास शिलचर से दूर होने के कारण अधिकांश काम मुझे ही करना पड़ता था। प्रेरणा भारती नामकरण तत्कालीन संघ के विभाग प्रचारक माननीय महेन्द्र शर्माजी ने दिया था। 2 अंक ईटखोला से प्रकाशित होने के बाद बाकी केशव निकेतन, अम्बिकापट्टी से प्रकाशित हुआ। साहित्य व समाचार का मिला-जुला मिश्रण थी प्रेरणा भारती जो एक महीना-डेढ़ महीना पर मिलती थी। इसके छपने से लेकर बांटने तक और पैसा जुटाने तक सारा दारोमदार मेरे ऊपर था। मैंने प्रेरणा भारती के लिए अपने उत्तर प्रदेश के मित्रों, रिश्तेदारों व बराक वैली के सभी सम्पर्कित स्थानों तक घर-घर खाक छानी रुपया भी जुटाया किन्तु लोगों में रुचि न जगा सका। 

1998 में ही समाचार पत्रों के पंजीयक से शीर्षक अनुमोदन भी प्राप्त कर लिया। किन्तु 8 अंक बाद ही मैं धीरे-धीरे केशव स्माारक संस्कृति सुरभि के कार्यों में व्यस्त होता गया। एकल विद्यालय योजना, रथ योजना, रामकथा योजना, ग्राम विकास योजना, धर्म जागरण आदि बढ़ते कार्यों के चलते प्रेरणा भारती के लिए समय देना मुश्किल हो गया और अर्थाभाव एक बड़ा कारण था। लोगों के पास प्रेरणा भारती 

लेकर जाता था, लोग कहते थे, इसमें क्या है, मैं क्यों खरीदूँ? कोई कहता था हिन्दी पेपर नहीं चलेगा। पूरी मेहनत, लगन व परिश्रम से तैयार प्रेरणा भारती का तिरस्कार देखा नहीं गया और मजबूरन प्रेरणा भारती 1999 में बन्द हो गयी।

मैंने चार वर्ष सुरभि का काम किया, 2003 में जब उत्तर असम में हिन्दीभाषियों पर हमले शुरु हुए और स्थानीय समाचार पत्रों में खबरों को दबाया जाने लगा तब लोगों को महसूस हुआ कि एक अपना समाचार पत्र होना चाहिए। माननीय रामअवतार अग्रवाल, उदय शंकर गोस्वामी, सत्येन्द्र प्रसाद सिंह सहित सभी प्रमुख व्यक्तियों ने आग्रह किया कि धन की व्यवस्था हो जाएगी आप पुनः प्रेरणा भारती प्रारंभ किजिए। सभी के अनुरोध पर हिन्दी दिवस 2003 से फिर से प्रेरणा भारती का प्रकाशन प्रारंभ हो गया, जो शनैः शनैः मासिक से पाक्षिक, पाक्षिक से साप्ताहिक और अब दैनिक के रुप में प्रकाशित हो रही है। संपादक के रूप में 2003 से ही प्रेरणा भारती को मिली श्रीमती सीमा कुमार जिनके अनवरत परिश्रम व लगन से प्रेरणा भारती की यात्रा निरन्तर जारी है। 

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मुद्रणालर होने के बाद भी समस्राओं का आना जारी रहा। एक बार फिर सहरोगिरों, शुभचिंतकों के सहरोग व प्रेरणा से निजी भवन बनाने का कार्र 2011 में कटहल रोड, शिलचर में प्रारम्भ हुआ और मार्च 2013 में प्रेरणा भारती का कार्रालर व मुद्रणालर श्रीराम महायज्ञ के माध्यम से निजी भवन में स्थापित हुआ। प्रेरणा भारती के अब तक की यात्रा में माननीय श्री रामअवतार अग्रवाल (विशिष्ट समाजसेवी), श्रीरामजी (पूर्व महाप्रबंधक बीएसएनएल), श्री रामकुमार मल्लाह (समाजसेवी), श्री कमलेश सिंह (चाय उद्योग के प्रमुख स्तम्भ), श्री संतोष कुमार श्रीवास्तव (पूर्व उप कुलसचिव, एनआईटी शिलचर), श्री राजेश मल्लाह (सॉफ्टवेयर इंजीनियर), श्री राजेन कुँवर (युवा समाजसेवी) श्री प्रदीप गोस्वामी (बीएसएनएल अभियंता), सुनील कुमार सिंह (शिक्षक समाजसेवी), स्व. दीपचंद शर्मा व श्री शान्तीलाल डागा (व्यवसायी, समाजसेवी) आदि का सतत अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान है। अभी भी  हमारे सम्मुख सरकारी असहरोगिता के फलस्वरुप समस्राओं का पहाड़ खड़ा है।

प्रेरणा भारती के निजी भवन में आने के बाद अब पाठकों का धैर्य जवाब देने लगा। सभी बोलने लगे अपना प्रेस है, कार्यालय है, 8 साल से साप्ताहिक पढ़ रहे हैं, अब दैनिक कीजिए। दैनिक करने के बाद होने वाले भारी-भरकम व्यय का अंदाजा करते ही पसीने छूटने लगते थे, फिर भी सबकी इच्छा का सम्मान रखते हुए 7 मार्च 2016 से प्रेरणा भारती दैनिक का प्रकाशन प्रारंभ हो गया। दैनिक करने से पूर्व हमने केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के अधिकारियों से सम्पर्क किया था कि दैनिक होने पर विज्ञापन मिलेगा क्या? सबने कहा था कि एकमात्र राष्ट्रभाषा का समाचार पत्र है क्यों नहीं मिलेगा? मैंने इसी आशा और विश्‍वास में दैनिक का प्रकाशन शुरु किया और फरवरी 2017 में केन्द्र सरकार के विज्ञापन विभाग डी.ए.वी.पी. और राज्य सरकार के विज्ञापन विभाग डी.आइ.पी.आर.ओ. में विज्ञापन हेतु इम्पैनलमेन्ट के लिए आवेदन कर दिया। एक वर्ष हो गये, गौहाटी और दिल्ली के चक्कर लगा-लगा के थक गया। कहाँँ तो दैनिक का अनुमोदन मिलता, उल्टा जो साप्ताहिक में विज्ञापन मिल रहा था, वो भी बन्द हो गया। असम सरकार ने तो मई 2017 से बिल का भुगतान भी रोक रखा है। ऐसे में 20 वर्ष पूर्ण तो हो गए, अगर समाज ने साथ देने में तनिक भी कोताही की तो 21वां साल बहुत कठिन है। अब नैया है मँझधार, समाजरुपी प्रभु तुम ही हो खेवनहार॥