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श्रीनगर (समा.एजें) २ जून : जम्मू-कश्मीर में आतंकियों से जंग लड़ रहीं सुरक्षा एजेंसियों का सामना अब नए दुश्मन ङ्कबेडरूम जिहादियोंङ्क से हो रहा है।

ये अफवाहें फैलाने और युवाओं को प्रभावित करने के लिए अपने घरों में बैठकर सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। वरिष्ठ अधिकारियों की मानें तो यही नया युद्ध क्षेत्र है और यहीं नई लड़ाई है। हालांकि, यह लड़ाई पारंपरिक हथियारों से परंपरागत युद्ध क्षेत्रों में नहीं लड़ी जा रही। नए दौर के जिहादी जंग छेड़ने के लिए कंप्यूटरों और स्मार्टफोन्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसा वह कश्मीर के भीतर या बाहर, अपने घर से या सडक़ से, नजदीकी कैफे या फुटपाथ, कहीं से बैठकर कर सकते हैं।सुरक्षा एजेंसियों को सबसे ज्यादा चिंता अमरनाथ यात्रा को लेकर है जो २९ जून से शुरू होने वाली है। आशंका है कि वॉट्सऐप, फेसबुक और ट्विटर जैसे प्लैटफॉर्म के जरिए नए दौर के जिहादी इस ४० दिवसीय तीर्थयात्रा से पहले घाटी में सांप्रदायिक दंगे भडक़ा सकते हैं। एक सीनियर पुलिस अधिकारी ने कहा, ङ्कयह आभासी युद्ध क्षेत्र है जहां शब्दों को हथियार बनाकर लड़ाई लड़ी जाती है। इसका युवाओं पर असर पड़ता है।ङ्क कई अधिकारियों का मानना है कि आने वाले दिनों में जम्मू-कश्मीर में अफवाहें फैलाई जा सकती हैं और इससे निबटने के लिए उनके पास ज्यादा वक्त नहीं बचा है। एक पुलिस अधिकारी ने कहा, ङ्कअपने बिस्तर या सोफे पर बैठकर कोई भी हजारों चैट ग्रुप्स में से किसी एक पर भी ऐसी खबर डाल सकता है, जिससे पूरा राज्य सांप्रदायिक हिंसा में सुलग उठेगा।ङ्क एक बार जम्मू-कश्मीर से धरा ३७० हटा दिया जाय, तो सारे किसम के आतंकवादी और जिहादी अपने-आप खतम हो जायेंगें यह बत एक दूध पीते बच्चे को भी समझ आ रहा हैें लेकिन, पता नही भारत सरकार क्या पीकर बैठी है।खतरे की बात यह है कि ऐसे सोशल चैट ग्रुप्स केवल जम्मू-कश्मीर से ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली, बाकी के देश और यहां तक कि विदेशों से भी सक्रिय हैं। अधिकारी, कश्मीरी पंडित समुदाय से आने वाले एक कॉन्स्टेबल से जुड़ी घटना का उदाहरण देकर समझाते हैं कि इस छिपे हुए दुश्मन से निपटना कितना मुश्किल है। यह कॉन्स्टेबल लापता हो गया था और काफी तलाश के बाद उसका शव यहां से ९० किमी दूर उत्तर कश्मीर के कुपवाड़ा में मिला था।