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नई दिल्ली (समा.एजें) ११ जून : उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि व्यक्तिगत करदाताओं के १०.५२ लाख ‘फर्जीङ्क पैन कार्डों के आंकड़े को देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने के लिहाज से बेहद छोटा नहीं बताया जा सकता.

यह आंकड़ा ऐसे कुल दस्तावेजों का ०.४ प्रतिशत है. शीर्ष न्यायालय ने कहा कि यह बात रिकॉर्ड में आ चुकी है कि ११.३५ लाख फर्जी या नकली पैन नंबरों की पहचान की गई है और इनमें से १०.५२ लाख मामले व्यक्तिगत करदाताओं से जुड़े हैं. न्यायालय ने पैन कार्ड को जारी करने और टैक्स रिटर्न दाखिल करने में आधार को अनिवार्य बनाने की आयकर कानून की धारा १३९एए को वैध ठहराते हुए १५७ पन्नों के फैसले में ये बातें कहीं. हालांकि न्यायालय ने तब तक के लिए इसे लागू किए जाने पर आंशिक रोक लगा दी, जब तक उसकी संवैधानिक पीठ आधार से जुड़े निजता के अधिकार के वृहद मुद्दे पर गौर नहीं कर लेती. कानून की धारा १३९एए आयकर रिटर्न दाखिल करने के लिए और पैन कार्ड के आवंटन की याचिका दायर करने के लिए आधार या उसके लिए किए गए आवेदन के पंजीकरण संबंधी जानकारी देने को अनिवार्य बनाती है. यह बात एक जुलाई से लागू होनी है. न्यायमूर्ति ए के सीकरी की अध्यक्षता वाली पीठ ने शुक्रवार को कहा, ‘याचिकाकर्ताओं ने यह दलील देने की कोशिश की कि फर्जी पैन कार्ड वाले लोग महज ०.४ प्रतिशत हैं, इसलिए ऐसे किसी प्रावधान की जरूरत नहीं है.ङ्क पीठ ने अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी की ओर से दायर अभ्यावेदनों में कही गई इस बात पर गौर किया कि फर्जी पैन कार्डों का इस्तेमाल फर्जी कंपनियों को धन पहुंचाने में इस्तेमाल किया जाता था. इस बात पर पीठ ने कहा, तथ्य यह है कि कंपनियां अंतत: कुछ लोगों की ओर से ही चलाई जाती हैं और इन लोगों को अपनी पहचान दिखने के लिए दस्तावेज पेश करने होते हैं. इसमें कहा गया कि कर प्रणाली में आधार को लेकर आना कालेधन या काला धन सफेद करने पर रोक लगाने के उपायों में से एक है. इस योजना को सिर्फ इस आधार पर ‘खारिजङ्क नहीं किया जा सकता कि इस उद्देश्य की पूर्ण पूर्ति नहीं हो सकेगी. इस बुराई की जड़ें बहुत गहरी हैं और इससे निपटने के लिए कई कदम उठाने की जरूरत है. ये कदम एकसाथ उठाए जा सकते हैं. इन कदमों के मिलेजुले प्रभाव परिणाम लेकर आ सकते हैं और यह जरूरी नहीं कि अलग-थलग तौर पर उठाया गया प्रत्येक कदम काफी हो.