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मैंने आपकी पत्रिका प्रेरणा भारती  मे असम वि. वि. मे हो रही आंदोलन पर छापा समाचार(०४ मई २०१६ ) पढ़ा मुझे पता नहीं आपके सूत्र क्या हैं, परंतु पत्रिका मे लिखी गयी कुछ बातो से मै असहमत हु । जिनपे मै आपका दृष्टि आकर्षित करना चाहता हूँ। 

 

१. आपने लिखा है, आंदोलन करने वाले उत्तेजित छात्रो के चलते गेट के भीतर रहे लोग बाहर आने का साहस भी नहीं कर पा रहें थे, एवं छात्रो के मनमानी के चलते कर्मचारियों एवं प्रशासनिक अधिकारियों को काफी परेशानी झेलनी पड़ी, पर अगर छात्र उत्तेजित होते तो वंहा तोड़फोड़, मारपीट जैसी घटनाए भी सामने आती, लेकिन छात्र वंहा शांति से बैठे थे और मांग कर रहे थे कि वि. वि. के तरफ से कोई सामने आए और उनकी भी सुनें हाँ जंहा इतने लोग जमेंगे थोड़ा शोर तो होगा हीें।, २. आपने लिखा है  पुलिस को मजबूर होकर लाठीचार्ज करना पड़ा। पर क्या रात को १.३० बजे लाठी चार्ज करना सही था ,जबकि वंहा सिर्फ छात्र नहीं बहुत छात्राएँ भी थी पर वंहा कोई भी महिला पुलिस भी नहीं थी ें पुरुष पुलिस कर्र्मी द्वारा छात्राओं को पिटा जाना कितना दूर तक सही है, और अगर दिनभर में छात्रो से बातचीत करने की कोशिश की गयी होती तो उन्हे रातको १.३० बजे तक बैठने की ज़रूरत ही ना पड़ती।, ३. छात्रो पर लाठी चार्ज करने के लिए छात्रो ने डीसी एवं एसपी को माफी मांगने को नहीं कहा। बल्कि उनका कहना ये था की लाठीचार्ज करने के पीछे जो भी जिम्मेदार है उनका नाम बताया जायें वंहा उपस्थित अभिजीत गुरांव जी ने तथा मैजिस्टड्ढेट ने खुद शांति बनाए रखने के लिए छात्रो को सराहा और कई बार धन्यवाद भी कहा।

४. इस आंदोलन को राष्ट्रविरोधी नाम दिया जा रहा है, परंतु यंहा ऐसा कुछ नहीं था जिसे हम राष्ट्रविरोधी शक्ति का नाम दे सके छात्रो की मांग बस इतनी सी थी की परीक्षा को एक हफ्ते आगे ले जाया जाये, ताकि उन्हे थोड़ा वक़्त मिल सके और जो छात्र आंदोलन पर उतरे थे, उन्होने तो कभी ये नहीं कहा की वो परीक्षा नहीं देंगे या सिर्फ उनकी ही परीक्षा को टाला जाये और ऐसे आंदोलन तो असम वि. वि. मे पहले भी हो चुके हैं ें पिछले दिनो आए तूफान से जो तबाही हुई वो सबको पता है, जिसके चलते आज भी कई इलाको मे बिजली और पानी नहीं पहुँच पा रहा ।

-मनीष पाण्डेय, असम विवि शिलचर, असम