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·नरेंद्र नाथ,

मोदी सरकार ने बुधवार को महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) के लिए क्रीमी लेयर की उच्चतम सीमा २ लाख रुपये बढ़ाकर ८ लाख रुपये कर दी,

वहीं ओबीसी जातियों के बीच सब-कैटिगरी बनाने की भी पहल कर दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में इसके लिए एक आयोग के गठन को मंजूरी दी गई। यह आयोग १२ महीने में अपनी रिपोर्ट देगा, जिसके बाद सब-कैटिगरी में आने वाली जातियों के आरक्षण को अलग-अलग भागों में बांटा जा सकता है। सरकार का दावा है कि ओबीसी के अंदर सब-कैटिगरी बनाने से ज्यादा से ज्यादा जरूरतमंदों को आरक्षण का लाभ मिल सकेगा। बिहार सहित ९ राज्य पहले ही ऐसा कर चुके हैं। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने हालांकि कहा कि देश के अंदर आरक्षण व्यवस्था पर पुनर्विचार का सरकार का कोई इरादा नहीं है। अनुसूचित जातियों के लिए सब-कैटिगरी बनाने के विचार से भी सरकार ने इनकार किया। इस फैसले का व्यापक राजनीतिक असर होगा। यह पीएम मोदी और अमित शाह की सोशल इंजिनियरिंग का मेगा प्लान है। जानकार इस आयोग के गठन को मंडल पार्ट-२ भी मान रहे हैं। जानते हैं, इस फैसले का बड़ा राजनीतिक असर कैसे होगा? बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में मायावती और अखिलेश यादव से निपटने के लिए सोशल इंजिनियरिंग की थी। गैर यादव समेत सभी पिछड़ी जातियों को एकजुट करने में बीजेपी ने पूरी ताकत लगाई थी। इसमें पार्टी को भरपूर सफलता भी मिली। बीजेपी ने इन जातियों से आने वाले लोगों को लगभग डेढ़ सौ सीटों पर टिकट दिए। बीजेपी की बड़ी जीत में गैर यादव और पिछड़ी जातियों के ध्रुवीकरण को सबसे बड़ा कारण माना गया। यूपी के अलावा देश के अधिकतर बड़े राज्यों में इन्हीं पिछड़ी जातियों की तादाद सबसे अधिक है। ऐसे में बीजेपी अब यूपी फाम्र्युले को देश के सभी राज्यों और २०१९ आम चुनाव में भी अपनाना चाहती है। बिहार में इस फाम्र्युले में सबसे बड़े बाधक नीतीश कुमार थे, लेकिन अब जबकि वह खुद एनडीए का हिस्सा हैं तो बीजेपी को बिहार में इससे बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है। नीतीश ने बिहार में ओबीसी को अलग-अलग श्रेणी में बांटने की पहल की थी। उन्होंने महादलित की श्रेणी भी बनाई, जो बाद में उनका बड़ा वोट बैंक बनी। बिहार में नीतीश ने गैर यादव पिछड़ी जातियों को एकजुट कर लालू को राजनीति में हाशिए पर ला दिया था, लेकिन २०१५ में नीतीश के लालू के हाथ मिलाने के बाद भी बीजेपी इसमें सेंध नहीं लगा सकी। अब आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में मोदी सरकार ओबीसी की नई श्रेणी बनाकर इसका पूरा राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर सकती है।

अमित शाह के नेतृत्व में बीजेपी ने अलग तरह की सोशल इंजिनियरिंग की थी। झारखंड में गैर आदिवासी, हरियाणा में गैर जाट, महाराष्ट्र में ब्राह्मण को सीएम बनाकर उन्होंने मौजूदा राजनीतिक टड्ढेंड को बदलने का संदेश दिया। उन्हें इसका लाभ भी मिला। मोदी सरकार का दावा है कि ओबीसी में अलग श्रेणी बनाने का लाभ सभी जातियों को मिलेगा। हर जाति को नौकरियों में हिस्सा मिलेगा। मालूम हो कि मंडल कमिशन लागू होने के बाद ओबीसी को सरकारी नौकरियों में २७ फीसदी आरक्षण मिलता है, लेकिन पिछले दिनों एक रिपोर्ट सामने आई, जिसमें कहा गया कि केंद्रीय कर्मचारियों में मात्र १२ फीसदी ओबीसी हैं। इनमें भी अधिकांश लाभ इनकी मजबूत जातियों को ही मिला है। अब सरकार इन ओबीसी को ३ श्रेणियों में बांटेगी। तीनों के बीच २७ फीसदी के आरक्षण को उनके प्रतिनिधित्व के हिसाब से बांटा जाएगा। सब कुछ इतना आसान भी नहीं होगा। मोदी सरकार की ओर से प्रक्रिया शुरू होने के बाद इन अलग-अलग श्रेणियों में शामिल हर जाति ज्यादा से ज्यादा लाभ लेने का दावा पेश करेगी। ऐसे में सबको खुश रखना सरकार के सामने फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती है।वहीं ओबीसी को अलग-अलग श्रेणी में बांटने के फैसले को ऐतिहासिक और पिछड़ों के लिए हितकारी बताते हुए केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने कहा कि मोदी सरकार ने साफ कर दिया है कि आरक्षण की मौजूदा नीति में कोई बदलाव नहीं होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि एससी को अलग-अलग श्रेणियों को बांटने का सवाल ही नहीं है। यह सिर्फ पिछड़ी जातियों का मामला है।