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अर्थव्यवस्था को डिजिटल करने की रफ्तार तेज करने के संकेत नोटबंदी के इस समय में अगर सरकार व बैंकों के तमाम आश्वासनों

के बावजूद वेतन दिवस पर राहत मिलने की उम्मीद लगाए लोग बुरी तरह निराश हुए हैं तो अब लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि आने वाले दिनों में नकदी की वह सुविधा नहीं मिलने वाली है जो ८ नवंबर के पहले थी। सरकार और बैंक भले दावा कर रहे हैं कि पांच सौ के नोट छप के आ रहे हैं, एटीएम कैलीबरेट कराए जा रहे हैं और हवाई जहाजों से नोट पहुंचाए जा रहे हैं, लेकिन हर कर्मचारी और उसके परिवार के जीवन में पूर्णमासी के चांद की तरह खुशियां लेकर आने वाला वेतन दिवस लोगों को लाइन में खड़ा करके निकल गया है।

बैंकों में जरूरत के लिहाज से सिर्फ एक-चौथाई नोट ही आ पाए। यह इस बात का संकेत है कि सरकार अब चलन में उतनी संख्या में नोट नहीं डालने वाली है, जितनी संख्या में पहले थे और अब वह अर्थव्यवस्था को डिजिटल करने की दिशा में ही बड़ा प्रयास करेगी। यह काम चाहे जितना पीड़ादायक हो, लेकिन नरेंद्र मोदी जब तक प्रधानमंत्री रहेंगे तब तक इसी दिशा में कदम उठाएंगे। हाल में महाराष्ट्र और गुजरात के स्थानीय निकायों में मिली भाजपा की विजय ने उनके हौसले और बढ़ा दिए हैं। नोटबंदी की दिशा तभी बदल सकती है जब जनता स्वयं सरकार को कोई बड़ा संदेश दे, क्योंकि विभाजित विपक्ष के विरोध का सरकार पर कोई असर नहीं है। इसलिए सरकार के तमाम आश्वासनों को दिलासा के रूप में लेते हुए नागरिकों को कार्ड से भुगतान करने और ऑनलाइन सामान खरीदने की प्रक्रिया को सीख लेना चाहिए। लेकिन परिवर्तन की यह प्रक्रिया सहज और सुलभ नहीं है। इस प्रक्रिया में वे लोग बुरी तरह प्रभावित होंगे जो न तो प्लास्टिक धन का उपयोग जानते हैं और न ही डिजिटल बैंकिंग। उधर उन कंपनियों को भारी लाभ होगा, जो इस तरह की मशीनें बनाती और बेचती हैं। इस फैसले से बैंकिंग उद्योग भारी दबाव में है और उनकी आंतरिक शिकायतें भी कम नहीं हैं।

निजी बैंकों का कहना है कि सरकारी बैंकों को पांच सौ के नोट दिए गए हैं जबकि उन्हें महज दो हजार के नोट मिल रहे हैं। बैंकिंग प्रणाली की इस आंतरिक खींचतान के बीच एचडीएफसी और फेडरेशन ऑफ रिटेल टड्ढेडर्स एसोसिएशन के बीच नकदी देने व भुगतान के लिए दुकानों पर पीओएस मशीनें लगाने का समझौता यही संकेत देता है कि डिजिटल होने की प्रक्रिया तेज है भले ही उसका आम जनता को लाभ मिलने का समय अनिश्चित है।