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जम्मू के नगरोटा में आतंकवादियों ने मंगलवार सुबह सेना के एक शिविर पर हमला किया।

इसमें भारतीय सेना के दो अफ़सरों और पांच सैनिकों की मौत हो गई। भारत ने २९ सितंबर को पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाले कश्मीर में जाकर सर्जिकल स्टड्ढाइक की थी। कहा गया था कि उससे पाकिस्तान को भारी नुकसान हुआ। लेकिन तब से पाकिस्तान ने सीमा उल्लंघन की घटनाएं बढ़ा दीं। जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी कार्रवाइयों में तो इस साल के आरंभ से ही भारी बढ़ोतरी हुई है। मंगलवार को मारे गए सैन्यकर्मियों को मिला कर इस वर्ष अब तक ८९ भारतीय सुरक्षाकर्मी जम्मू-कश्मीर में हुए आतंकवादी हमलों में अपनी जान गंवा चुके हैँ। सर्जिकल स्टड्ढाइक के बाद मरे सुरक्षाकर्मियों की संख्या २७ तक पहुंच चुकी है। ये आंकड़े तस्दीक करते हैं कि सरकार की तरफ से दिए गए सख्त बयानों का कोई जमीनी असर नहीं हो रहा है।

क्या यह महज संयोग है? या इसे सुरक्षा रणनीति की खामी के रूप में देखा जा सकता सकता है? इस वर्ष की शुरुआत के साथ पठानकोट हमला हुआ था। उसके बाद तीनों सेनाओं के अधिकारियों को लेकर एक समिति बनी। रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल फिलिप काम्पोज की अध्यक्षता में ये समिति सुरक्षा इंतजाम पुख्ता करने के उपाय सुझाने के लिए बनाई गई थी। समिति ने मई के मध्य में रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर को अपनी रिपोर्ट सौंपी। उसने हमलों को रोकने के लिए कई सुझाव दिए। मसलन, घुसपैठ का पता लगाने और सुरक्षा के लिए उचित परिधि वाला सिस्टम लगाने, संतरियों को कुशल उपकरणों से लैस करने, खुफिया सतर्कता प्रणाली लगाने और स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग सिस्टम को पूर्णतः नया रूप देने की सिफारिश की गई। लेकिन मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इन उपायों पर अमल के नगण्य प्रयास हुए हैँ। जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा एवं सीमा से लेकर आबादी वाले इलाकों तक में तीन लाख से अधिक फौजी तैनात हैँ।

उनकी तैनाती का हर स्थान ऐसा नहीं है, जहां हिफाजत के पूरे इंतजाम हो। अतः वे अक्सर आतंकवादियों का आसान निशाना बन जाते हैँ। लेकिन उड़ी या नगरोटा जैसी जगहों पर सैनिक कैंप पर घातक हमला होना बेहद चिंता का विषय है। एनडीए सरकार पाकिस्तान को सबक सिखाना चाहती है, तो उस पर सारा देश उसके साथ है। मगर ऐसी सबक सिखाने का कोई नतीजा नहीं होगा, जिसमें बाद में हमारे सुरक्षाकर्मी भी निशाना बनते रहें। रक्षा के बिना अचूक उपाय के आक्रामकता लंबी अवधि में अति हानिकारक सिद्ध हो सकती है।