Offcanvas Info

Assign modules on offcanvas module position to make them visible in the sidebar.

A A A

नोटबंदी के बाद नए नोट पाने के लिए आम लोगों की जद्दोजहद के बीच आयकर विभाग के छापों में बड़े पैमाने पर पकड़ी जा रही नगदी से कई सवाल उभरे हैं।

इन छापों से यह तो लग रहा है कि सरकार काले धन के खिलाफ सख्त कदम उठा रही है, मगर जहां आम लोगों को दो हजार रुपए पाने के लिए कई दिन इंतजार करना और घंटों कतार में खड़े रहना पड़ता है, वहीं कुछ लोगों ने कैसे इतना सारा पैसा आसानी से हासिल कर लिया। शनिवार को दिल्ली की एक कंपनी पर पड़े छापे में १३.५ करोड़ रुपए पकड़े गए, जिनमें ढाई करोड़ रुपए के नए नोट थे। कर्नाटक में चित्रदुर्ग के हवाला कारोबारी से पांच करोड़ सत्तर लाख रुपए, तमिलनाडु के वेल्लोर में चौबीस करोड़ रुपए, हैदराबाद के वरिष्ठ पोस्ट ऑफिस सुपरिंटेंडेंट के यहां से छियासठ लाख रुपए, वहीं एक और व्यक्ति के घर से इकहत्तर लाख रुपए के नए नोट पकड़े गए। इसके पहले भी विभिन्न राज्यों से बड़े पैमाने पर नए नोट पकड़े जा चुके हैं। जगह-जगह पुलिस ने भी नाकेबंदी करके गाड़ियों में से भारी मात्रा में नए पकड़े हैं। पिछले महीने कश्मीर में मारे गए दो आतंकवादियों के पास से भी नए नोट बरामद किए गए थे।

आयकर विभाग की छापेमारियों से मिले पैसों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि काला धन जमा करने वालों ने किस तरह सरकार की घोषित चाकचौबंद योजना में बड़ी आसानी से सेंधमारी की। एक हजार और पांच सौ रुपए के पुराने नोट बंद करने की योजना के पीछे सरकार का मकसद था कि इससे बड़े पैमाने पर काला धन सामने आएगा। इसलिए शुरुआती दौर में गैर-कानूनी तरीके से रखे पैसे को जमा कराने पर कर भुगतान को लचीला रखा गया था। पुरानी नगदी बदलने और पैसा निकालने की भी सीमा रखी गई थी। रोज नए नियम बनाए जाते रहे। आयकर कानून में संशोधन कर कहा गया कि अगर कोई अपनी नाजायज कमाई घोषित करेगा, तो सरकार उसका पचास फीसद हिस्सा रख कर बाकी को जायज करार दे देगी। मगर उसका भी कोई उत्साहजनक नतीजा सामने नहीं आया। इसकी बड़ी वजह यही होगी कि लोगों को बैंकों से सांठगांठ कर पुराने के बदले नए नोट आसानी से मिल गए।

काले धन को सफेद करने के मामले में कुछ जगहों पर बैंक कर्मियों को गिरफ्तार भी किया गया। मगर सवाल है कि क्या इतने बड़े पैमाने पर नोटबदली सिर्फ कुछ बैंक कर्मियों के लोभ की वजह से संभव हो पाई। छिपी बात नहीं है कि सार्वजनिक परिवहन विभागों, गैस एजेंसियों, पेटड्ढोल पंपों, चीनी मिलों, सहकारी समितियों, जनधन खातों आदि के जरिए बड़े पैमाने पर पुराने नोट चलन में लाए गए। बैंक कर्मियों ने कुछ तो कमीशन के लोभ में और कुछ रसूखदार लोगों के प्रभाव में पुराने के बदले नए नोट की जमाखोरी में मदद की। इससे सरकार की काले धन पर अंकुश लगाने की कोशिश काफी हद तक बेकार गई है। अब सवाल है कि अगर काले धन पर अंकुश लगाने का कारगर तरीका आयकर विभाग की छापेमारी ही साबित हो सकती है, तो फिर नोटबंदी का हासिल क्या है। इतने दिनों तक मानवश्रम और पैसे की बर्बादी, कारोबार के नुकसान, आम लोगों की परेशानी, खुदकुशी और मौत की कीमत पर भी अगर काला धन, भ्रष्टाचार, आतंकवाद आदि पर नकेल कसने में कामयाबी मिलती नहीं दिख रही, तो निस्संदेह इससे सरकार की जवाबदेही बढ़ गई है।