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लेख

देशभर में हर्षोल्लास के साथ १४ qसतबर को हिन्दी दिवस मनाया जाएगा।


    समाज में जब कभी सहिष्णुता की चर्चा चलेगी तो सहिष्णुता के मुद्दे पर मीडिया का मकबूल चेहरा ही नुमाया होगा. मीडिया का जन्म सहिष्णुता की गोद में हुआ और वह सहिष्णुता की घुट्टी पीकर पला-बढ़ा. शायद यही कारण है कि जब समाज के चार स्तंभों का जिक्र होता है तो मीडिया को एक स्तंभ माना गया है. समाज को इस बात का इल्म था कि यह एक ऐसा माध्यम है जो कभी असहिष्णु हो नहीं सकता. मीडिया की सहिष्णुता का परिचय आप को हर पल मिलेगा. एक व्यवस्था का मारा हो या व्यवस्था जिसके हाथों में हो, वह सबसे पहले मीडिया के पास पहुंच कर अपनी बात रखता है. मीडिया ने अपने जन्म से कभी न्यायाधीश की भूमिका नहीं निभायी लेकिन न्याय और अन्याय, सुविधा और सुरक्षा, समाज में शुचिता और देशभक्ति के लिए हमारे एक ऐसे पुल की भांति खड़ा रहा जो हमेशा से निर्विकार है, निरपेक्ष है और स्वार्थहीन. यह गुण किसी भी असहिष्णु व्यक्ति, संस्था या पेशे में नहीं होगा. इस मायने में मीडिया हर कसौटी पर खरा उतरता है और अपनी सहिष्णुता के गुण से ही अपनी पहचान बनाये रखता है.
    मीडिया की सहिष्णुता के गुण को समझने के लिए थोड़े विस्तार की जरूरत होगी. पारम्परिक संचार माध्यमों से उन्नत होते हुए मीडिया आज हथेलियों पर आ चुका है. मीडिया की उन्नति समाज के किसी और पेशे के लिए ईष्या का कारण हो सकती है क्योंकि तकनीक के विकास के साथ आज तक कोई ऐसी चिकित्सा पद्धति नहीं बन सकी जो चलते-फिरते आपका दर्द दूर कर सके, कोई तकनीक नहीं कि कोई इंजीनियर हथेली पर रखे यंत्र से निर्माण कार्य को अंजाम दे सके या कोई ऐसी तकनीक पुलिस व्यवस्था के पास नहीं आ पायी है जिससे अपराध पर नियंत्रण पाया जा सके. तकनीक तो न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के पास भी नहीं है कि वह हथेली पर रखे यंत्र से अपने कार्य और निर्णय को समाज तक पहुंचा सके. केवल एकमात्र मीडिया है जो हथेली पर रखे यंत्र से समाज में सूचना, शिक्षा और मनोरंजन पहुंचाने में कामयाब होता है. यह मीडिया की ताकत है कि वह उन सूचनाओं को नेपथ्य में ढकेल देता है जिससे समाज की शुचिता बाधित होती है. यह मीडिया ही है जो लाखों किलोमीर बसे लोगों को एक-दूसरे से जोड़ता है और उनके अच्छे कामों से समाज को परिचित कराता है. शासन और सरकार लाखों योजनाएं बना लें लेकिन मीडिया के बिना समाज से जुड़ जाने की कोई विधा सरकार के पास नहीं है. जनहित की सूचनाओं को लोगों तक तटस्थ भाव से पहुंचाने का काम मीडिया ही करता है. समाज के चौथे स्तंभ का दर्जा पाये मीडिया को अपनी जवाबदारी का अहसास है इसलिए वह पूरी सहिष्णुता के साथ अपने दायित्व की पूर्ति के लिए हमेशा तत्पर रहता है. मीडिया सहिष्णुता के कई आयाम हैं. प्राकृतिक आपदाओं के समय जब लोग डरे-सहमे अपने घरों में संशय में जी रहे होते हैं तब मीडिया अपनी जान की परवाह किए बिना तूफान हो या प्लेग, भूकंप हो जलजला, घटनास्थल पर पहुंच कर समाज को राहत देने की कोशिश करता है. अपनी जान की परवाह किए बिना, अपने परिवार से बेखबर समाज की चिंता में मीडिया उन खबरों पर हाथ डालने से भी नहीं चूकता जिनसे रसूखदारों को बेनकाब करना होता है. यह सब संभव हो पाता है कि मीडिया के सहिष्णुता के कारण. अपवाद को छोड़ दें तो मीडिया कभी अतिरेक में नहीं बहता. वह संयमित रहता है लेकिन मीडिया का रोमांच उसकी सक्रियता का सबब है.
    निरपेक्ष और नि:स्वार्थ भाव से समाज और देश के लिए जुटे रहने वाला मीडिया हमेशा सवालों से घिरा रहता है. समाज का मीडिया पर इतना अधिक विश्वास है कि वह मीडिया की मानवीय भूल के कारण भी होने वाली एक गलती को बर्दाश्त नहीं कर पाता है. समाज की अपेक्षाएं इस कठिन समय में अगर किसी से शेष रह गयी है तो वह मीडिया है. उसे एक डाक्टर से इस बात की अपेक्षा नहीं है कि जो डाक्टर इस बात की शपथ लेता है कि वह नि:स्वार्थ रूप से समाज की भलाई के लिए कार्य करेगा लेकिन आए दिन आने वाली खबरें बताती है कि क्या हो रहा है. एक इंजीनियर से भी वह निराश है. अनेक दुर्घटनाओं का कारण उसके द्वारा बनायी गई घटिया पुल और पुलिया है जो अचानक टूट जाती हैं जिससे अकारण अनेक लोग मौत के मुंह में समा जाते हैं. नेता और प्रशासन भी समाज के लिए बहुत उत्साह का भाव पैदा नहीं करते हैं. अक्सर वे चर्चा में इन्हें अपनी विश्वास की प्राथमिकता में नहीं रखते हैं किन्तु जब बात मीडिया की आती है तो सर्वाधिक शिकायतें मीडिया से होती है. सहिष्णु मीडिया के लिए समाज का यह भाव स्थायी पूंजी है. जब जब मीडिया की आलोचना होती है, समाज जब तब उस पर अविश्वास का भाव जताता है, वह असहिष्णु नहीं होता है और ना ही अपनी आलोचना से घबराता है. समाज की आलोचना ही मीडिया की असली ताकत है. इस आलोचना के कारण ही उसे बेहतर करने के लिए ऊर्जा मिलती है. समाज जब मीडिया पर अविश्वास जताता है तो मीडिया फोरम पर इसकी चर्चा होती है और चिंता की जाती है कि हम अपनी इस कमजोरी को कैसे दूर करें. समाज ऊपर उल्लेखित प्रोफेशन पर भी अविश्वास जताता है लेकिन ये लोग इसकी फ्रिक नहीं करते हैं और ना ही किसी फोरम में इस पर चर्चा करते दिखते हैं.
    इनकी बेपरवाही का मूल कारण इनके भीतर की असहिष्णुता है और इस असहिष्णुता के मूल में है साधन जबकि मीडिया के पास सहिष्णुता इसलिए है कि उसके पास न्यूनतम साधन हैं किन्तु साध्य एक ही है देश और समाज कल्याण. इस बात का उल्लेख करना जरूरी हो जाता है कि हर वर्ष अंतर्राष्ट्रीय संगठन इस बात का आंकड़ा जारी करते हैं कि अपने कार्य को अंजाम देते हुए हर वर्ष सैकड़ों की संख्या में मीडिया साथी मौत के घाट उतार दिए जाते हैं. यह अलग तरह का पैशन है जहां मौत डराती नहीं है बल्कि साहस जगाती है और दूसरे साथी उस काम को करने के लिए जुट जाते हैं. यह सब कुछ संभव होता है मीडिया की सहिष्णुता से. असहिष्णु होकर आप बदला लेने पर उतारू हो जाते हैं. आपका लक्ष्य बदल जाता है लेकिन मीडिया के पास रिवेंज का कोई रास्ता नहीं होता है. वह गलत को गलत कहने में नहीं चूकता है तो सही की तारीफ करने में भी वह गुरेज नहीं करता है. सहिष्णुता मीडिया का गुण-धर्म है और अपने इसी गुण-धर्म की वजह से वह समाज का चौथा स्तंभ कहलाता है. आखिर में अपने अनुभव के साथ मैं यह कह सकता हूं कि इस समाज में दो तरह के सैनिक हैं एक वह जो सीमा पर खड़े होकर देश की रक्षा करता है तो दूसरा मीडिया जो समाज के बीच रहकर समाज में शुचिता बनाये रखने का कार्य करता है. दोनों सैनिकों का गुण है सहिष्णुता.

हिन्दी का नाम आजकल हिन्दीभाषी क्षेत्र के राजनैतिकों के लिए एक कष्टदायक शब्द हो गया है।


दिल्ली नगर निगमों के चुनाव ने जिस तरह की राष्ट्रीय सुर्खियां पाईं हैं वह अस्वाभाविक नहीं है। दिल्ली देश की राजधानी भी है। इन सबसे अलग लोगों का इस चुनाव पर ध्यान कई कारणों से था। सबसे पहला तो यही कि एक समय भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान से उभरी तथा राष्ट्रीय विकल्प का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी के लिए यह चौथा चुनाव तथा २०१५ के विधानसभा में ७० में से ६७ सीटें जीतने के अपार बहुमत के बाद पहला चुनाव था। इस नाते लोग यह देखना चाहते थे कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी को वही लोकप्रियता प्रदेश में प्राप्त है या उसमें छीजन हुआ है। पंजाब एवं गोवा में मुंह की खाने के बाद ऐसा सवाल लोगों के मन मे ंउभरना बिल्कुल स्वाभाविक था। वैसे भी आप का हर वक्तव्य, उसके हर कदम राष्ट्रीय चर्चा के विषय बनते रहे हैं। इसमें ऐसा कोई चुनाव जिसमें उसे मुख्य चुनौती माना जा रहा हो उसे कोई स्थानीय मानकर नजरअंदाज कैसे कर सकता था। दूसरी तरफ भाजपा ने इस चुनाव को स्थानीय की बजाय राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य देने की रणनीति अपनाई। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में शानदार सफलता के बाद लोग यह देखना चाहते थे कि भाजपा की विजय धारा कायम रहती है या उस पर किसी तरह का ब्रेक लगता है। ऐसा नहीं था कि दिल्ली नगर निगमों के चुनाव में स्थानीय मुद्दे नहीं थे, लेकिन यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बनाम अरविन्द केजरीवाल में परिणत हो गया था। और सबसे अंत में कांग्रेस की दशा क्या रहती है इसमें भी लोगों की अभिरुचि थी।
    इन सब कारकों को एक साथ मिलाकर विचार करें तो निष्कर्ष यही आएगा कि स्थानीय नगर निगमों का चुनाव होते हुए भी इसका राष्ट्रीय महत्व था। इस तरह जो परिणाम आए हैं उनका महत्व भी राष्ट्रीय है। कई लोग मत प्रतिशत को आधार बनाकर अलग-अलग निष्कर्ष निकाल रहे हैं। मसलन, इसमें भाजपा को ३६.०८ प्रतिशत, आप को २६.२३ प्रतिशत तथा कांग्रेस को २१.०९ प्रतिशत मत मिला है। २०१२ के निगम चुनाव में भाजपा को ३६.७४ प्रतिशत मत मिला था। इसके आधार पर कुछ लोग कह रहे हैं कि भाजपा का मत तो थोड़ा घटा है। उस समय संघर्ष दो ध्रुवीय था। तब आप नहीं थी। जब तीन पार्टियों होंगी तो मतों में थोड़ा अंतर आएगा ही। वैसे भी यह अंतर इतना नहीं है जिसे बहुत महत्व दिया जाए। अगर २०१५ के विधानसभा के अनुसार देख जाए तो भाजपा को ३२.०२ प्रतिशत तथा आप को ५४.०३ प्रतिशत मत मिला था। आप के मतों में करीब २८ प्रतिशत की कमी आई है और यह असाधारण कमी हैं। दो वर्ष कुछ महीने में इतने ज्यादा मतों का छीजन किसी पार्टी के बारे में विरोधी जन मनोविज्ञान का स्पष्ट प्रमाण है। इसके अनुसार भाजपा के मतों में करीब ४ प्रतिशत की वृद्धि हुई है। कांग्रेस को २०१५ के विधानसभा चुनाव में ९.७ प्रतिशत मत मिला था। तो उसका मत बढ़ा है। लेकिन कांग्रेस को २०१२ में ३०.५० प्रतिशत मत मिले थे। तो वहां तक पहुंचने में वह सफल नहीं रही है। यह उसकी चिंता को बनाए रखने वाला है। अगर २०१४ लोकसभा चुनाव के अनुसार देखें तों भाजपा को ४६.४० प्रतिशत, कांग्रेस को १५.१० प्रतिशत तथा आप को ३२.९० प्रतिशत मत मिला था। इसके अनुसार भाजपा के मतों में भारी कमी, आम के मतों में भी कमी एवं कांग्रेस के मतों में वृद्धि हुई है। तो क्या इससे हम चुनाव का मूल्यांकन कर दें?
    इसके आधार पर मूल्यांकर करें तो चुनाव परिणाम से सबसे ज्यादा खुश कांग्रेस को होना चाहिए, जबकि ऐसा है नही। वह दूसरी जगह की पार्टी भी नहीं रही, तीसरे स्थान पर खिसक गई। वास्तव में कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव साधारण झटका नहीं है। इसके पूर्व रजौड़ी गार्डन उप चुनाव में भाजपा के बाद वह दूसरे स्थान पर थी। इसका निष्कर्ष यह निकाला गया कि दिल्ली का राजनीतिक चरित्र फिर से परंपरागत स्थान पर लौट रहा है। यानी आम आदमी पार्टी पराभव की ओर है तथा दिल्ली की राजनीति भाजपा बनाम कांग्रेस में परिणत हो रही है। वास्तव में कांग्रेस के पास इसका अवसर था। कांग्रेस स्वयं इस अवसर का लाभ उठाने में सक्षम नहीं हो सकी हैं तो इसके कारण गहरे हैं। वस्तुतः पंजाब में कांग्रेस की विजय अवश्य हुई, लेकिन २०१३ से ज्यादातर राज्यों और लोकसभा चुनाव में पराजय के दंश से वह उबरी नहीं है। खिसके जनाधार को पाने, नेतृत्व की क्षमता के प्रति अविश्वास को दूर करने तथा विचारधारा को लेकर कायम अस्पष्टता को खत्म करने के लिए कांग्रेस ने इन सालों में ऐसा कुछ नहीं किया है जिससे जन धारणा में बदलाव आए। इन कारणों से पार्टी के अंदर निराशा है तथा वह अंदरुनी कलह का भयावह शिकार है। दिल्ली नगर निगम चुनाव अभियान के दौरान कई प्रमुख नेताओं के साथ रिकॉर्ड संख्या मेंं लोगों ने कांग्रेस का दामन छोड़ा। जाहिर है, कांग्रेस की इस स्थिति को केवल दिल्ली तक सीमित नहीं माना जा सकता। इसका पूरा परिप्रेक्ष्य राष्ट्रीय है। इस तरह कांग्रेस के लिए गहरे आत्ममंथन का परिणाम है यह।  जहां तक भाजपा का प्रश्न है तो उसके लिए यह विजय की धारा का आगे बहते रहना है। भाजपा के विरोधी चाहे कुछ भी कहें, निष्पक्षता से विश्लेषण करने पर इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता अभी जनता में कायम है। चुनाव था निगम का और नाम नरेन्द्र मोदी का। भाजपा ने इसे इस तरह प्रचारित किया कि मोदी जिस तरह का नया भारत बनाना चाहते हैं दिल्ली उसका अंग है। इसलिए यदि दिल्ली को भी मोदी के सपने के अनुरुप बनाना है तो भाजपा को मत दीजिए। चुनाव परिणाम इस बात का प्रमाण है कि लोगों ने इस अपील को स्वीकार किया। यानी मोदी पर विश्वास किया है। दिल्ली नगर निगम चुनाव परिणाम को देखकर यह मानकर चलना पड़ेगा कि इसका असर आगामी राज्य विधानसभा चुनावों पर भी होगा। यह सारे विपक्ष के लिए चिंता का कारण बनेगा। ऐसा नहीं है कि भाजपा में कमियां नहीं हैं, वह गलतियां नहीं कर रहीं लेकिन सफलता सारी गलतियों व कमियों को ढंग देती हैं जबकि असफलता में छोटी-छोटी गलतियां और कमियां भी उजागर हो जातीं हैं। भाजपा ने अपने सभी पुराने पार्षदों का टिकट काटकर १० वर्ष के सत्ता विरोधी रुझान को कम करने की रणनीति अपनाई। इस कारण जगह-जगह विद्रोह का आलम भी था और भाजपा इससे कुछ सीटें हारीं भी लेकिन जनता ही निकलकर भाजपा को मोदी के नाम पर वोट दे रही थी इसलिए उसे पिछली बार की तुलना में ४३ सीटों का फायदा हो गया।
    चुनाब परिणाम यदि सबसे ज्यादा आधात किसी के लिए साबित हुआ है तो वह है आम आदमी पार्टी यानी आप। निष्कर्ष बहुत सरल है। जनता ने अरविन्द केजरीवाल सरकार के कार्य, उनके और उनके साथियों की राजनीतिक व्यवहार शैली के खिलाफ गुस्सा व्यक्त किया है। इतनी बुरी हार का सीधा मतलब है कि जनता ने आप के खिलाफ प्रतिशोधात्मक मतदान किया है। यानी आपने जो ईमानदार, नैतिक, सदाचार और शालीनता से भरे शासन तथा राजनीतिक-व्यक्तिगत आचरण का वायदा किया आप का काम उसके विपरीत रहा है। ऐसा नहीं है कि आप सरकार ने बिल्कुल काम नहीं किया, या कोई अच्छा काम नहीं किया, लेकिन उससे अपेक्षाएं बिल्कुल अलग थीं। वह देश को राजनीति में एक नए विकल्प देने के दावे के साथ सत्ता में आई थी। अरविन्द केजरीवाल की एकाधिकारवादी शैली के कारण वे सब लोग पार्टी से बाहर हो गए या कर दिए गए जो उन पर प्रश्न खड़ा कर सकते थे, उनके किसी बात को नकार सकते थे या उनसे कह सकते थे कि आप ऐसा नहीं करें या ऐसा करें। यह सब विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद हुआ। आज आप के नेता दिल्ली परिणाम को ईवीएम लहर बताकर जनादेश का अपमान कर रहे हैं। इसका अर्थ है कि जनता से इनका संपर्क इतने कम समय में ही कट गया है। इसलिए वे समझ नहीं पा रहे कि जनता के ंअंदर उनको लेकर कितना गुस्सा है। तो कुल मिलाकर इस चुनाव परिणाम का निष्कर्ष यह है कि देश को राजनीतिक विकल्प देने का विश्वास देने वाली पार्टी इस समय अपने केन्द्र दिल्ली में ही अंतिम सांसें गिनना शुरु कर रही है। इसलिए जो विकल्प की राजनीति चाहते हैं उन्हें नए सिरे से प्रयास करना होगा। दूसरे, अभी मोदी ऐसा नाम है जिसके समानांतर कोई नेता लोकप्रियता के मुकाबलें में राष्ट्रीय क्षितिज पर नहीं। और कांग्रेस के लिए अपने को संभालने तथा फिर से खड़ा करने के लिए बहुत ज्यादा और कई स्तरों पर सतत काम करने की आवश्यकता है।
अवधेश कुमार, ई.ः३०, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः११००९२, दूर.ः०११२२४८३४०८, ०९८११०२७२०८