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लेख

संजीव कानु, शिलचर : बराकघाटी का एकमात्र हिन्दी दैनिक प्रेरणा भारती हम हिन्दीभाषियों का अभिमान है।

• संजीव शर्मा

आज के समर में जब खून के रिश्तों का मोल नहीं है,परिवार टूट रहे हैं , लोग अपनों तो दूर मां-बाप की भी जिम्मेदारी उठाने से बच रहे हैं और जाति-धर्म की दीवारें समाज को निरंतर बाँट रहीं हैं, ऐसे में किसी दूसरे धर्म के तीन अनाथ बच्चों को सहारा देना वाकई काबिले तारी़फ है और वह भी तब इन तीन बच्चों में से दो विकलांग हों...लेकिन कहते हैं न कि रदि कुछ करने की चाह हो तो इंसानिरत सबसे ब़डा धर्म बन जाती है और फिर रही भावना मदद के लिए हाथ आगे ब़ढाने की ताकत देती है. कुछ ऐसा ही हाल पेंगू अहमद ब़डभुइरां का है. मणिपुरी मूल के मुस्लिम पेंगू अहमद सिलचर फुटबाल अकादमी में चौकीदार हैं और अपनी सीमित आर में सिलचर से दूर गाँव में रह रहे अपने मूल परिवार में चार बच्चों का किसीतरह भरण पोषण करते हैं लेकिन इसके बाद भी इन अनाथ-बेसहारा बच्चों को अपनाने में उन्होंने जरा भी हिचक नहीं दिखाई.

पेंगू के मानवता परिवार में सबसे पहले विष्णु शामिल हुआ. विष्णु के पैर जन्म से ख़्राब हैं और जब वह छोटा ही था तभी मां चल बसी. इसके बाद विष्णु के पिता ने दूसरी शादी कर ली और जैसा कि आमतौर पर होता है कि सौतेली मां ने विकलांग बच्चे को नहीं अपनारा और घर से निकाल दिरा. असहार पेंगू सिलचर रेलवे स्टेशन पर भीख मानकर गुजर बसर करने लगा लेकिन एक बार किसी वीआईपी के दौरे के समर रेलवे पुलिस ने उसे स्टेशन से भी बाहर निकाल दिरा. विष्णु ने फिर एक पे़ड के नीचे शरण ली. एक दिन भारी बारिश में भीगते और ठण्ड से थर थर कांपते विष्णु पर पेंगू की नज़र प़डी तो वो उसे अपने साथ ले आरा. अब दोनों का साथ 7 साल का हो गरा है.

दूसरा बच्चा लक्खी(लक्ष्मी) प्रसाद के पैर एक आग दुर्घटना में इतनी बुरीतरह जल गए कि उसके घुटने ही नहीं है इसलिए हाथों के सहारे चलता है. लक्खी के पिता के निधन के बाद मां ने दूसरी शादी कर ली और नए पिता ने विकलांग लक्खी को बोझ समझकर अपने घर से निकाल दिरा. वह स़डक पर,दुकानों के बरामदों रा फुटपाथ पर रात गुजारता था. सैंक़डों लोग रोज देखते थे लेकिन किसी ने भी सहारा नहीं दिरा परन्तु पेंगू की स्नेहमरी दृष्टि प़ड गरी और वह भी उसके साथ रहने के लिए ़फुटबाल अकादमी के एक कमरे के घर में आ गरा. तीसरा बच्चा प्रदीप अपने आप आ गरा.वह अनाथ था और विष्णु-लक्खी से उसे पेंगू अहमद के बारे में पता चला तो पितृतुल्र पेंगू ने उसे भी अपना लिरा. सबसे अच्छी बात रह हुई कि ़फुटबाल अकादमी के पदाधिकारिरों ने भी इन अनाथ विकलांग बच्चों को अपने परिसर में रखने पर आपत्ति नहीं की और पेंगू का रह परिवार भी समर के साथ पटरी पर आ गरा. लगभग 55 साल के पेंगू को सारे बच्चे प्रार से दादू कहते हैं।

पेंगू ने अपने संपर्कों की मदद से दोनों विकलांग बच्चों को  मुफ्त में ट्राई साइकिल दिलवा दी जिससे उनका चलना-फिरना आसान हो गरा. इतने साल से पेंगू ही मां-बाप बनकर इन बच्चों की देखभाल कर रहा है. उन्हें नहलाने धुलाने से लेकर उनका बिस्तर लगाना और खाना बनाने,बीमार प़डने पर दवाई कराना जैसे तमाम काम पेंगू अपनी व्रस्त दिनचर्रा के बाद भी माथे पर शिकन लारे बिना सालों से करता आ रहा है.अब प्रदीप को नौकरी पर रखवा दिरा सिलिरे जिम्मेदारिरों का बोझ कुछ कम हुआ है . पेंगू का परिवार भी इन बच्चों से घुल मिल गरा है और पेंगू जब भी अपने घर जाता है तो उसकी पत्नी इन बच्चों के लिए भी खाने-पीने का सामान भेजती है.वाकई आज के मतलबी और आत्मकेंद्रित समर में पेंगू अहमद ब़डभुइरां किसी ़फरिश्ते से कम नहीं है और समाज के लिए अनुकरणीर भी.

 

•दिलीप कुमार

मैं 1995 में असम के बराकघाटी के काछाड़ जिले के उधारबंद ग्राम में संघ के निर्देश से चाय बागान क्षेत्र में सेवा कार्य व धर्म जागरण के लिए आया। 2 साल उधारबंद, बड़खला, कालाइन व काठीघोड़ा एरिया में काम करके मैंने चाय जनगोष्ठी की पीड़ा महसूस की, जहाँ समस्याओं का अम्बार था। जीवन स्तर दयनीय और पिछड़ा हुआ है।

पूर्वोत्तर के बराक घाटी में हिंदी साहित्य की अहर्निश सेवा में तत्पर श्री अशोक वर्मा जी ने करीब दो दशक पहले मेरी दो कहानियों (हमशक्ल तथा अंगूठी) को १९९९ में प्रकाशित कहानी संग्रह ‘सब्ज लहर के  लोग‘ में स्थान दिया था ।