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लेख


    समाज में जब कभी सहिष्णुता की चर्चा चलेगी तो सहिष्णुता के मुद्दे पर मीडिया का मकबूल चेहरा ही नुमाया होगा. मीडिया का जन्म सहिष्णुता की गोद में हुआ और वह सहिष्णुता की घुट्टी पीकर पला-बढ़ा. शायद यही कारण है कि जब समाज के चार स्तंभों का जिक्र होता है तो मीडिया को एक स्तंभ माना गया है. समाज को इस बात का इल्म था कि यह एक ऐसा माध्यम है जो कभी असहिष्णु हो नहीं सकता. मीडिया की सहिष्णुता का परिचय आप को हर पल मिलेगा. एक व्यवस्था का मारा हो या व्यवस्था जिसके हाथों में हो, वह सबसे पहले मीडिया के पास पहुंच कर अपनी बात रखता है. मीडिया ने अपने जन्म से कभी न्यायाधीश की भूमिका नहीं निभायी लेकिन न्याय और अन्याय, सुविधा और सुरक्षा, समाज में शुचिता और देशभक्ति के लिए हमारे एक ऐसे पुल की भांति खड़ा रहा जो हमेशा से निर्विकार है, निरपेक्ष है और स्वार्थहीन. यह गुण किसी भी असहिष्णु व्यक्ति, संस्था या पेशे में नहीं होगा. इस मायने में मीडिया हर कसौटी पर खरा उतरता है और अपनी सहिष्णुता के गुण से ही अपनी पहचान बनाये रखता है.
    मीडिया की सहिष्णुता के गुण को समझने के लिए थोड़े विस्तार की जरूरत होगी. पारम्परिक संचार माध्यमों से उन्नत होते हुए मीडिया आज हथेलियों पर आ चुका है. मीडिया की उन्नति समाज के किसी और पेशे के लिए ईष्या का कारण हो सकती है क्योंकि तकनीक के विकास के साथ आज तक कोई ऐसी चिकित्सा पद्धति नहीं बन सकी जो चलते-फिरते आपका दर्द दूर कर सके, कोई तकनीक नहीं कि कोई इंजीनियर हथेली पर रखे यंत्र से निर्माण कार्य को अंजाम दे सके या कोई ऐसी तकनीक पुलिस व्यवस्था के पास नहीं आ पायी है जिससे अपराध पर नियंत्रण पाया जा सके. तकनीक तो न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के पास भी नहीं है कि वह हथेली पर रखे यंत्र से अपने कार्य और निर्णय को समाज तक पहुंचा सके. केवल एकमात्र मीडिया है जो हथेली पर रखे यंत्र से समाज में सूचना, शिक्षा और मनोरंजन पहुंचाने में कामयाब होता है. यह मीडिया की ताकत है कि वह उन सूचनाओं को नेपथ्य में ढकेल देता है जिससे समाज की शुचिता बाधित होती है. यह मीडिया ही है जो लाखों किलोमीर बसे लोगों को एक-दूसरे से जोड़ता है और उनके अच्छे कामों से समाज को परिचित कराता है. शासन और सरकार लाखों योजनाएं बना लें लेकिन मीडिया के बिना समाज से जुड़ जाने की कोई विधा सरकार के पास नहीं है. जनहित की सूचनाओं को लोगों तक तटस्थ भाव से पहुंचाने का काम मीडिया ही करता है. समाज के चौथे स्तंभ का दर्जा पाये मीडिया को अपनी जवाबदारी का अहसास है इसलिए वह पूरी सहिष्णुता के साथ अपने दायित्व की पूर्ति के लिए हमेशा तत्पर रहता है. मीडिया सहिष्णुता के कई आयाम हैं. प्राकृतिक आपदाओं के समय जब लोग डरे-सहमे अपने घरों में संशय में जी रहे होते हैं तब मीडिया अपनी जान की परवाह किए बिना तूफान हो या प्लेग, भूकंप हो जलजला, घटनास्थल पर पहुंच कर समाज को राहत देने की कोशिश करता है. अपनी जान की परवाह किए बिना, अपने परिवार से बेखबर समाज की चिंता में मीडिया उन खबरों पर हाथ डालने से भी नहीं चूकता जिनसे रसूखदारों को बेनकाब करना होता है. यह सब संभव हो पाता है कि मीडिया के सहिष्णुता के कारण. अपवाद को छोड़ दें तो मीडिया कभी अतिरेक में नहीं बहता. वह संयमित रहता है लेकिन मीडिया का रोमांच उसकी सक्रियता का सबब है.
    निरपेक्ष और नि:स्वार्थ भाव से समाज और देश के लिए जुटे रहने वाला मीडिया हमेशा सवालों से घिरा रहता है. समाज का मीडिया पर इतना अधिक विश्वास है कि वह मीडिया की मानवीय भूल के कारण भी होने वाली एक गलती को बर्दाश्त नहीं कर पाता है. समाज की अपेक्षाएं इस कठिन समय में अगर किसी से शेष रह गयी है तो वह मीडिया है. उसे एक डाक्टर से इस बात की अपेक्षा नहीं है कि जो डाक्टर इस बात की शपथ लेता है कि वह नि:स्वार्थ रूप से समाज की भलाई के लिए कार्य करेगा लेकिन आए दिन आने वाली खबरें बताती है कि क्या हो रहा है. एक इंजीनियर से भी वह निराश है. अनेक दुर्घटनाओं का कारण उसके द्वारा बनायी गई घटिया पुल और पुलिया है जो अचानक टूट जाती हैं जिससे अकारण अनेक लोग मौत के मुंह में समा जाते हैं. नेता और प्रशासन भी समाज के लिए बहुत उत्साह का भाव पैदा नहीं करते हैं. अक्सर वे चर्चा में इन्हें अपनी विश्वास की प्राथमिकता में नहीं रखते हैं किन्तु जब बात मीडिया की आती है तो सर्वाधिक शिकायतें मीडिया से होती है. सहिष्णु मीडिया के लिए समाज का यह भाव स्थायी पूंजी है. जब जब मीडिया की आलोचना होती है, समाज जब तब उस पर अविश्वास का भाव जताता है, वह असहिष्णु नहीं होता है और ना ही अपनी आलोचना से घबराता है. समाज की आलोचना ही मीडिया की असली ताकत है. इस आलोचना के कारण ही उसे बेहतर करने के लिए ऊर्जा मिलती है. समाज जब मीडिया पर अविश्वास जताता है तो मीडिया फोरम पर इसकी चर्चा होती है और चिंता की जाती है कि हम अपनी इस कमजोरी को कैसे दूर करें. समाज ऊपर उल्लेखित प्रोफेशन पर भी अविश्वास जताता है लेकिन ये लोग इसकी फ्रिक नहीं करते हैं और ना ही किसी फोरम में इस पर चर्चा करते दिखते हैं.
    इनकी बेपरवाही का मूल कारण इनके भीतर की असहिष्णुता है और इस असहिष्णुता के मूल में है साधन जबकि मीडिया के पास सहिष्णुता इसलिए है कि उसके पास न्यूनतम साधन हैं किन्तु साध्य एक ही है देश और समाज कल्याण. इस बात का उल्लेख करना जरूरी हो जाता है कि हर वर्ष अंतर्राष्ट्रीय संगठन इस बात का आंकड़ा जारी करते हैं कि अपने कार्य को अंजाम देते हुए हर वर्ष सैकड़ों की संख्या में मीडिया साथी मौत के घाट उतार दिए जाते हैं. यह अलग तरह का पैशन है जहां मौत डराती नहीं है बल्कि साहस जगाती है और दूसरे साथी उस काम को करने के लिए जुट जाते हैं. यह सब कुछ संभव होता है मीडिया की सहिष्णुता से. असहिष्णु होकर आप बदला लेने पर उतारू हो जाते हैं. आपका लक्ष्य बदल जाता है लेकिन मीडिया के पास रिवेंज का कोई रास्ता नहीं होता है. वह गलत को गलत कहने में नहीं चूकता है तो सही की तारीफ करने में भी वह गुरेज नहीं करता है. सहिष्णुता मीडिया का गुण-धर्म है और अपने इसी गुण-धर्म की वजह से वह समाज का चौथा स्तंभ कहलाता है. आखिर में अपने अनुभव के साथ मैं यह कह सकता हूं कि इस समाज में दो तरह के सैनिक हैं एक वह जो सीमा पर खड़े होकर देश की रक्षा करता है तो दूसरा मीडिया जो समाज के बीच रहकर समाज में शुचिता बनाये रखने का कार्य करता है. दोनों सैनिकों का गुण है सहिष्णुता.

 एमसीडी के नतीजे आ गए हैं और जैसी कि आशंका थी... चुनाव में भाजपा ने आप और कांग्रेस की तकरीबन दो तिहाई धुलाई कर डाली है! असली मुद्दों से भटक कर ईवीएम की रस्सी को सांप साबित करने की कोशिशें अब भी जारी हैं और नतीजों पर आप की प्रीरिकार्डेड प्रतिक्रिया लगातार बज रही है... आप जीते तो मतदाता की जीत और भाजपा जीते तो मशीन की जीत! इधर, दिल्ली डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने ट्विटर पर लिखा... भाजपा ने २००९ का चुनाव हारने के बाद पांच साल ईवीएम पर रिसर्च कर महारत हासिल की और आज उसी रिसर्च और महारत के दम पर चुनाव जीत रही है. भाजपा ने ईवीएम पर केवल रिसर्च नहीं की बल्कि इनके नेता जीबीएल नरसिंहाराव व आडवाणी जी ने किताब भी लिखी, इनके नेता सुप्रीम कोर्ट भी गए थे. ईवीएम टेम्परिंग देश के लोकतंत्र की ऐसी कड़वी सच्चाई है जिसका शुरू में मजाक उड़ सकता है लेकिन मजाक के डर से हम सच बोलना नहीं छोड़ सकते!एमसीडी चुनाव में मिली हार का ठीकरा आम आदमी पार्टी ने ईवीएम पर फोड़ा है. आप नेता और दिल्ली सरकार में मंत्री गोपाल राय ने केजरीवाल के घर बैठक के बाद कहा कि... दिल्ली में जो परिणाम आए उसमें भाजपा को जो जीत मिली है वो ईवीएम लहर से ही संभव है. ईवीएम के माध्यम से भाजपा देश में तानाशाही लाना चाहती है. यूपी और उत्तराखंड की ईवीएम लहर को दिल्ली में भाजपा ने रिपीट किया है. आम आदमी पार्टी परिणाम की समीक्षा करेगी लेकिन देश को कैसे बचाया जाए इस पर विचार करना होगा? लेकिन भईय्या, फिलहाल तो दल को कैसे बचाया जाए इस पर विचार करोगे तो ज्यादा बेहतर रहेगा! ईवीएम के आटे में गड़बड़ी का थोड़ासा नमक तो और भी समझ में आता लेकिन कोरे नमक की रोटी जनता को तो नहीं पची, अब आपवालों को भी कब्ज कर रही है! उधर, दिल्ली सरकार में मंत्री कपिल मिश्रा ने कहा... चुनाव नतीजों की जिम्मेदारी केवल ईवीएम पर नहीं डाली जा सकती. स्थिति चिंताजनक है और हमें सोचने की जरूरत है. दिल्ली में बीजेपी की लहर है इसे नकारा नहीं जा सकता! इसी तरह... एमसीडी चुनाव परिणामों के बीच पंजाब में आम आदमी पार्टी नेता भगवंत मान ने अरविंद भाई के नेतृत्व पर सवाल उठाया है. टिड्ढब्यून अखबार को दिए बयान में भगवंत मान ने कहा कि... पंजाब में बिना अपना कप्तान चुने हमने चुनाव लड़ा. हमारी टीम मोहल्ला क्रिकेट की टीम की तरह थी. हमने सीएम का उम्मीदवार घोषित नहीं किया, लोग इससे कंफ्यूजन में थे. पंजाब में जरनैल सिंह को उतारना बड़ा गलती थी. सीएम के चेहरे को लेकर लोगों में कंफ्यूजन पैदा हो गया!
    भाई भगवंत मान, दिल्ली का पिछला चुनाव भी कॉलेज इलैक्शन की तरह ही था, जब आप को करिश्माई कामयाबी मिली थी... जैसे कॉलेज में चवन्नी की चाय जैसे आश्वासनों के दम पर चुनाव तो जीत जाते हैं लेकिन हो कुछ नहीं पाता है... कुछ वैसा ही अनुभव दिल्ली की जनता को हुआ है! दिल्ली एमसीडी चुनाव परिणामों पर अरविंद भाई के गुरु अन्ना हजारे की प्रतिक्रिया आयी है जो आप के लिए राजनीतिक ज्ञानवर्धक हो सकती है! अन्ना ने कहा... चुनाव में आप को सही सफलता नहीं मिली ये दुर्भाग्य की बात है. जब आप पार्टी दिल्ली में चुनकर आयी थी तब लोगों की अपेक्षाएं बहुत थीं! आप पार्टी की हार का मुख्य कारण है कि जब चुनाव से पहले उन्होंने कहा कि... हम बंगला नहीं लेगें, गाड़ी नहीं लेंगे, तनख्वा नहीं लेंगे, लेकिन... चुनकर आने के बाद गाड़ी भी ली! बंगला भी लिया! ...और सैलरी भी ली! अरविंद केजरीवाल ने जो कहा वो नहीं किया. कथनी और करनी में फर्क ने आम आदमी पार्टी को हराया... आप पर लोगों का भरोसा कम हुआ है!
डेंगू का इलाज करो, थर्मामीटर का मजाक मत उड़ाओ अरविंद भाई! अभी भी वक्त है... ईवीएम जैसे मुद्दों पर भटकना-भटकाना छोडक़र मूल काम पर लौट आओ वरना... न दिल्ली हाथ में रहेगी... न दल हाथ में रहेगा!


दिल्ली नगर निगमों के चुनाव ने जिस तरह की राष्ट्रीय सुर्खियां पाईं हैं वह अस्वाभाविक नहीं है। दिल्ली देश की राजधानी भी है। इन सबसे अलग लोगों का इस चुनाव पर ध्यान कई कारणों से था। सबसे पहला तो यही कि एक समय भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान से उभरी तथा राष्ट्रीय विकल्प का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी के लिए यह चौथा चुनाव तथा २०१५ के विधानसभा में ७० में से ६७ सीटें जीतने के अपार बहुमत के बाद पहला चुनाव था। इस नाते लोग यह देखना चाहते थे कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी को वही लोकप्रियता प्रदेश में प्राप्त है या उसमें छीजन हुआ है। पंजाब एवं गोवा में मुंह की खाने के बाद ऐसा सवाल लोगों के मन मे ंउभरना बिल्कुल स्वाभाविक था। वैसे भी आप का हर वक्तव्य, उसके हर कदम राष्ट्रीय चर्चा के विषय बनते रहे हैं। इसमें ऐसा कोई चुनाव जिसमें उसे मुख्य चुनौती माना जा रहा हो उसे कोई स्थानीय मानकर नजरअंदाज कैसे कर सकता था। दूसरी तरफ भाजपा ने इस चुनाव को स्थानीय की बजाय राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य देने की रणनीति अपनाई। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में शानदार सफलता के बाद लोग यह देखना चाहते थे कि भाजपा की विजय धारा कायम रहती है या उस पर किसी तरह का ब्रेक लगता है। ऐसा नहीं था कि दिल्ली नगर निगमों के चुनाव में स्थानीय मुद्दे नहीं थे, लेकिन यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बनाम अरविन्द केजरीवाल में परिणत हो गया था। और सबसे अंत में कांग्रेस की दशा क्या रहती है इसमें भी लोगों की अभिरुचि थी।
    इन सब कारकों को एक साथ मिलाकर विचार करें तो निष्कर्ष यही आएगा कि स्थानीय नगर निगमों का चुनाव होते हुए भी इसका राष्ट्रीय महत्व था। इस तरह जो परिणाम आए हैं उनका महत्व भी राष्ट्रीय है। कई लोग मत प्रतिशत को आधार बनाकर अलग-अलग निष्कर्ष निकाल रहे हैं। मसलन, इसमें भाजपा को ३६.०८ प्रतिशत, आप को २६.२३ प्रतिशत तथा कांग्रेस को २१.०९ प्रतिशत मत मिला है। २०१२ के निगम चुनाव में भाजपा को ३६.७४ प्रतिशत मत मिला था। इसके आधार पर कुछ लोग कह रहे हैं कि भाजपा का मत तो थोड़ा घटा है। उस समय संघर्ष दो ध्रुवीय था। तब आप नहीं थी। जब तीन पार्टियों होंगी तो मतों में थोड़ा अंतर आएगा ही। वैसे भी यह अंतर इतना नहीं है जिसे बहुत महत्व दिया जाए। अगर २०१५ के विधानसभा के अनुसार देख जाए तो भाजपा को ३२.०२ प्रतिशत तथा आप को ५४.०३ प्रतिशत मत मिला था। आप के मतों में करीब २८ प्रतिशत की कमी आई है और यह असाधारण कमी हैं। दो वर्ष कुछ महीने में इतने ज्यादा मतों का छीजन किसी पार्टी के बारे में विरोधी जन मनोविज्ञान का स्पष्ट प्रमाण है। इसके अनुसार भाजपा के मतों में करीब ४ प्रतिशत की वृद्धि हुई है। कांग्रेस को २०१५ के विधानसभा चुनाव में ९.७ प्रतिशत मत मिला था। तो उसका मत बढ़ा है। लेकिन कांग्रेस को २०१२ में ३०.५० प्रतिशत मत मिले थे। तो वहां तक पहुंचने में वह सफल नहीं रही है। यह उसकी चिंता को बनाए रखने वाला है। अगर २०१४ लोकसभा चुनाव के अनुसार देखें तों भाजपा को ४६.४० प्रतिशत, कांग्रेस को १५.१० प्रतिशत तथा आप को ३२.९० प्रतिशत मत मिला था। इसके अनुसार भाजपा के मतों में भारी कमी, आम के मतों में भी कमी एवं कांग्रेस के मतों में वृद्धि हुई है। तो क्या इससे हम चुनाव का मूल्यांकन कर दें?
    इसके आधार पर मूल्यांकर करें तो चुनाव परिणाम से सबसे ज्यादा खुश कांग्रेस को होना चाहिए, जबकि ऐसा है नही। वह दूसरी जगह की पार्टी भी नहीं रही, तीसरे स्थान पर खिसक गई। वास्तव में कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव साधारण झटका नहीं है। इसके पूर्व रजौड़ी गार्डन उप चुनाव में भाजपा के बाद वह दूसरे स्थान पर थी। इसका निष्कर्ष यह निकाला गया कि दिल्ली का राजनीतिक चरित्र फिर से परंपरागत स्थान पर लौट रहा है। यानी आम आदमी पार्टी पराभव की ओर है तथा दिल्ली की राजनीति भाजपा बनाम कांग्रेस में परिणत हो रही है। वास्तव में कांग्रेस के पास इसका अवसर था। कांग्रेस स्वयं इस अवसर का लाभ उठाने में सक्षम नहीं हो सकी हैं तो इसके कारण गहरे हैं। वस्तुतः पंजाब में कांग्रेस की विजय अवश्य हुई, लेकिन २०१३ से ज्यादातर राज्यों और लोकसभा चुनाव में पराजय के दंश से वह उबरी नहीं है। खिसके जनाधार को पाने, नेतृत्व की क्षमता के प्रति अविश्वास को दूर करने तथा विचारधारा को लेकर कायम अस्पष्टता को खत्म करने के लिए कांग्रेस ने इन सालों में ऐसा कुछ नहीं किया है जिससे जन धारणा में बदलाव आए। इन कारणों से पार्टी के अंदर निराशा है तथा वह अंदरुनी कलह का भयावह शिकार है। दिल्ली नगर निगम चुनाव अभियान के दौरान कई प्रमुख नेताओं के साथ रिकॉर्ड संख्या मेंं लोगों ने कांग्रेस का दामन छोड़ा। जाहिर है, कांग्रेस की इस स्थिति को केवल दिल्ली तक सीमित नहीं माना जा सकता। इसका पूरा परिप्रेक्ष्य राष्ट्रीय है। इस तरह कांग्रेस के लिए गहरे आत्ममंथन का परिणाम है यह।  जहां तक भाजपा का प्रश्न है तो उसके लिए यह विजय की धारा का आगे बहते रहना है। भाजपा के विरोधी चाहे कुछ भी कहें, निष्पक्षता से विश्लेषण करने पर इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता अभी जनता में कायम है। चुनाव था निगम का और नाम नरेन्द्र मोदी का। भाजपा ने इसे इस तरह प्रचारित किया कि मोदी जिस तरह का नया भारत बनाना चाहते हैं दिल्ली उसका अंग है। इसलिए यदि दिल्ली को भी मोदी के सपने के अनुरुप बनाना है तो भाजपा को मत दीजिए। चुनाव परिणाम इस बात का प्रमाण है कि लोगों ने इस अपील को स्वीकार किया। यानी मोदी पर विश्वास किया है। दिल्ली नगर निगम चुनाव परिणाम को देखकर यह मानकर चलना पड़ेगा कि इसका असर आगामी राज्य विधानसभा चुनावों पर भी होगा। यह सारे विपक्ष के लिए चिंता का कारण बनेगा। ऐसा नहीं है कि भाजपा में कमियां नहीं हैं, वह गलतियां नहीं कर रहीं लेकिन सफलता सारी गलतियों व कमियों को ढंग देती हैं जबकि असफलता में छोटी-छोटी गलतियां और कमियां भी उजागर हो जातीं हैं। भाजपा ने अपने सभी पुराने पार्षदों का टिकट काटकर १० वर्ष के सत्ता विरोधी रुझान को कम करने की रणनीति अपनाई। इस कारण जगह-जगह विद्रोह का आलम भी था और भाजपा इससे कुछ सीटें हारीं भी लेकिन जनता ही निकलकर भाजपा को मोदी के नाम पर वोट दे रही थी इसलिए उसे पिछली बार की तुलना में ४३ सीटों का फायदा हो गया।
    चुनाब परिणाम यदि सबसे ज्यादा आधात किसी के लिए साबित हुआ है तो वह है आम आदमी पार्टी यानी आप। निष्कर्ष बहुत सरल है। जनता ने अरविन्द केजरीवाल सरकार के कार्य, उनके और उनके साथियों की राजनीतिक व्यवहार शैली के खिलाफ गुस्सा व्यक्त किया है। इतनी बुरी हार का सीधा मतलब है कि जनता ने आप के खिलाफ प्रतिशोधात्मक मतदान किया है। यानी आपने जो ईमानदार, नैतिक, सदाचार और शालीनता से भरे शासन तथा राजनीतिक-व्यक्तिगत आचरण का वायदा किया आप का काम उसके विपरीत रहा है। ऐसा नहीं है कि आप सरकार ने बिल्कुल काम नहीं किया, या कोई अच्छा काम नहीं किया, लेकिन उससे अपेक्षाएं बिल्कुल अलग थीं। वह देश को राजनीति में एक नए विकल्प देने के दावे के साथ सत्ता में आई थी। अरविन्द केजरीवाल की एकाधिकारवादी शैली के कारण वे सब लोग पार्टी से बाहर हो गए या कर दिए गए जो उन पर प्रश्न खड़ा कर सकते थे, उनके किसी बात को नकार सकते थे या उनसे कह सकते थे कि आप ऐसा नहीं करें या ऐसा करें। यह सब विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद हुआ। आज आप के नेता दिल्ली परिणाम को ईवीएम लहर बताकर जनादेश का अपमान कर रहे हैं। इसका अर्थ है कि जनता से इनका संपर्क इतने कम समय में ही कट गया है। इसलिए वे समझ नहीं पा रहे कि जनता के ंअंदर उनको लेकर कितना गुस्सा है। तो कुल मिलाकर इस चुनाव परिणाम का निष्कर्ष यह है कि देश को राजनीतिक विकल्प देने का विश्वास देने वाली पार्टी इस समय अपने केन्द्र दिल्ली में ही अंतिम सांसें गिनना शुरु कर रही है। इसलिए जो विकल्प की राजनीति चाहते हैं उन्हें नए सिरे से प्रयास करना होगा। दूसरे, अभी मोदी ऐसा नाम है जिसके समानांतर कोई नेता लोकप्रियता के मुकाबलें में राष्ट्रीय क्षितिज पर नहीं। और कांग्रेस के लिए अपने को संभालने तथा फिर से खड़ा करने के लिए बहुत ज्यादा और कई स्तरों पर सतत काम करने की आवश्यकता है।
अवधेश कुमार, ई.ः३०, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः११००९२, दूर.ः०११२२४८३४०८, ०९८११०२७२०८

सच में ही समय ठहरता नहीं, अपनी निर्बाध गति से निरन्तर चलता रहता है। देखते ही देखते एक वर्ष गुजर गया, कल ही की बात लग रही है। आज ही के दिन पिछली अक्षय तृतीया के दिन हमारे अंतरंग हमें छो‹ड कर परलोक गमन कर गये, जहाँ से आज तक कोई लौटकर नहीं आया। परलोक, स्वर्गलोक, नरकलोक, पितृलोक आदि ना जाने कितने लोक हैं। आज तक किसी ने नहीं देखा। अगर देखा भी है तो किसी ने आकर बताया नहीं कि वो लोक कैसा है? इस तरह के विषयों पर अक्सर उनसे खुलकर चर्चा होती थी। सन् १९९४ के अगस्त माह में उनसे पहली मुलाकात हुई। मैं उम्र में उनसे १५ वर्ष छोटा था, उनको भाईजी नाम से ही सब दिन संबोधन किया पर वे मेरे अभिन्न मित्रों में से एक थे। उनका सानिध्य गुरु रूप, पिता स्वरूप, ब‹डे भाई, मित्र हर रुप में एक अमिट यादगार सा बन कर रह गया। उनके साथ बिताये पलों को भूलना मुश्किल ही नहीं असंभव है। हर समय हँसता, मुस्कुराता और ठहाके मारता चेहरा आज भी आंँखों के सामने ज्यों का त्यों है।
    भाईजी एक सेल्फमेड व्यक्ति थे। जीवन के शुरुआती समय बहुत संघर्षमय रहा। राजस्थान चुरू जिले के एक छोटे से गाँव ‘मैनासरङ्क में उनका जन्म हुआ था। बाल्यकाल में ही पिता का देहान्त हो गया। खेती छो‹डकर आजीविका का कोई साधन नहीं था। माताजी बहुत साहसी और हिम्मतवाली महिला थीं। बिखरते परिवार की बागडोर माताजी ने बखूबी संभाली और उन विकट परिस्थितियों में भी भाईजी को १९६० के दशक में बी.ए. तक शिक्षा दिलवायीं। शिक्षा पूरी करते ही रतनग‹ढ में शिक्षक की नौकरी मिल गई। माताजी की वृद्धावस्था होने लगी और इसी बीच ब‹डे भाई का देहान्त हो गया। अब स्वयं के और ब‹डे भाई के पूरे परिवार की जिम्मेवारी भाईजी के कंधों पर थी। उन दिनों शिक्षकों को इतना कोई खास वेतन नहीं मिलता था कि वे दो-दो परिवारों की जरुरतों को पूरी कर सकें। आखिर बहुत सोच-विचार के बाद भाईजी ने नौकरी छो‹डकर असम की ओर रूख किया, पर गौहाटी में भी और कोई काम की तजबीज नहीं बैठी तो पुनः बतौर qहदी-संस्कृत शिक्षक के तौर पर नौकरी पर लग गये। इसी दौरान भाईजी की मुलाकात कलकत्ता के एक सेठजी से हो गयी। सेठजी की नजरों ने परख लिया की आदमी बहुत काम का है। बातचीत पक्की हो गयी और मास्टर की ५०० रु. की नौकरी छो‹डकर कलकत्ता सेठजी के यहाँ प्रति माह १००० रु. वेतन वाली नौकरी ज्वाइन कर ली। भाईजी की जैसे लॉटरी सी लग गयी। इनकी मेहनत, लगन और व्यवहार कुशलता देखकर सेठजी ने हाथीचेरा (उधारबंद) चाय बागान का प्रबंधक बना दिया। मेरे विचार से शायद ही कोई चाय बागान प्रबंधक होगा जिसने साईकिल से शिलचर आना-जाना किया होगा। भाईजी बताते थे कि कभी चायपत्ती लेकर गा‹डी आती थी तो गा‹डी में अन्यथा हाथीचेरा से शिलचर साईकिल से ही आता था। प्रबंध कुशलता के धनी सीधे सरल भाईजी ने सेठजी के कारोबार में दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करी लेकिन ऐवज में सेठजी की तरफ से कहने लायक कुछ नहीं किया गया। एक तो इनकी लालची प्रवृत्ति नहीं थी या समझ लें कि जो मिलता था, उसमें संतुष्ट थे। जबकि इनके साथ वालों को ५०-६० हजार तनख्वाह मिलती थी। १९९०-९१ में जब नौकरी छो‹डी तब इनका वेतन ५००० रुपया था। अपने हक की खाने वाले व्यक्ति ने पच्चीस वर्ष की नौकरी में पैसा नहीं पर इज्जत खूब कमायी। नौकरी के दौरान कभी परिवार का सुख नहीं भोगा, हमेशा अकेले ही रहें, कारण इस बीच माताजी चल बसी थीं और (गांव में भाभी जी ने दोनो परिवार संभाल रखे थे)।
    बागान की सर्विस छो‹डने के बाद स्वयं का व्यवसाय आरम्भ किया। पूँजी कम थी पर मार्केट में संपर्क अच्छे थे, गुडविल अच्छी थी इसलिए कारोबार में कोई विशेष कठिनाई का सामना नहीं करना प‹डा। इधर एक मात्र पुत्र प्रमोद को दिल्ली से एमबीए करवा दिया। प्रमोद जॉब भी करने लगा। पर एक आध साल में भाईजी बोले अब तो प्रमोद को नौकरी छु‹डवा कर मेरा कारोबार संभलवा देता हूँ, मैं और कितना करुँगा। बाद में ही संभालेगा तो फिर अभी से क्यों नहीं? अच्छा निर्णय था। प्रमोद के आने के बाद सामाजिक कार्यक्रमों में और अधिक सक्रिय रहने लगे। मेरा भी उनके यहाँ आना-जाना लगातार बना रहा। इसी बीच १९९८ में ‘वनबंधु परिषदङ्क की एकल विद्यालय योजना का शुभारम्भ हुआ। भाईजी को योजना का मुख्य प्रभारी बनाया गया। कार्यकर्ताओं में मुख्य थे श्री दिलीप जी (प्रेरणा भारती)। मैं भी इनके साथ गाँव-गाँव घूमा। बराकवैली के ऐसे-ऐसे गाँवों में गये जहाँ जाना तो दूर की बात, नाम भी नहीं सुना। वैसे तो समाज के और भी कईयों का योगदान रहा है, पर विशेष तौर पर भाईजी और दिलीप जी ने एकल विद्यालय के लिए जो मेहनत की थी वो विशेष उल्लेखनीय है।
    समाजसेवा के साथ-साथ आप एक ओजस्वी वक्ता भी थे, कोई भी विषय पर आप धारा प्रवाह बोलने की क्षमता रखते थे। हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा के भी जबरदस्त वक्ता थे। मैंने एक दिन पूछ लिया भाई आप इतनी अच्छी अंग्रेजी कैसे बोल लेते हैं, आप तो हिन्दी माध्यम से प‹ढे लिखे हैं। तब वे बोले मैं बागान में था, तब रोजाना सुबह डिक्शनरी से दस मिqनग लिखकर पॉकेट में रख लेता और बार-बार याद करता। यही कारण है मेरी अच्छी अंग्रेजी का।
    आप एक आध्यात्मिक व्यक्ति थे, पर अंधविश्वासी बिल्कुल नहीं। शुरु शुरु में देखा कि पूजा-पाठ में ज्यादा समय नहीं देते थे, कहते थे भाई पेट तो काम करने से भरेगा, पूजापाठ से नहीं। लेकिन पिछले ५-४ साल से भगवान की भक्ति में लगे रहते थे। सामाजिक कामों में भी थो‹डे सुस्त हो गये थे, जबकि पहले आप बहुत सारी संस्थाओं से जु‹डे हुए थे। पूर्वोत्तर मारवा‹डी सम्मेलन, शिलचर शाखा के आप अध्यक्ष रह चुके थे। आपकी अध्यक्षता में मारवा‹डी समाज ने श्री गोपाल अखा‹डा में संकटमोचन हनुमान का भव्य मंदिर निर्माण हुआ। बराक हिन्दी साहित्य समिति के जन्मकाल से ही आप सक्रिय सदस्य रहें। पिछले हिन्दी दिवस पर आपको (मरणोपरान्त) सम्मानित किया गया। वैसे तो आप असम के महामहिम राज्यपाल द्वारा भी सम्मानित हो चुके हैं।
    वक्त गुजरता चला जायेगा, सिर्फ और सिर्फ यादें रहेंगी। कहते हैं संसार से जाने वाले को स्वयं को आभास हो जाता है पर ईश्वर की ऐसी माया है कि जाने वाला प्राणी स्पष्टरूप से कह नहीं पाता। इशारों-इशारों में जरुर दर्शा देता है पर हम लोग समझ नहीं पाते। मुझे क्षमा कर देना भाईजी, मैं उस दिन समझ ही नहीं पाया था कि ठीक एक दिन पहले आपने ऐसा क्यों पूछा था कि -‘‘यमदूत दिखते हैं क्या?ङ्कङ्क मैंने तो सदा की तरह ही आपकी बात मजाक समझी और सहज भाव में ही कह दिया था कि हाँ दुनिया से जाने वाले को दिखता है। और आप चुप हो गये थे। कुछ समय बाद आप बोले - ‘‘गले की रुद्राक्ष माला तो गुटू (प्रमोद) को दे दूँगा। ङ्कङ्क अब समझ में आया कि आपने तो हमें ईशारा कर दिया था ‘अलविदा दोस्तोंङ्क, हम ही अना‹डी नहीं समझ सके।
    तुम गये तो हर खुशी चली गयी,
    तुम्हारे बिना चिरागों में रोशनी चली गयी।
    क्या कहें, क्या गुजरी है, इस दिल पे,
    हम qजदा रह गये, पर हमारी जिन्दगी चली गयी।।