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पहले खून की दलाली का बेतुका जुमला फिर संसद में अपने भाषण से भूचाल लाने की चेतावनी और अब प्रधानमंत्री के भ्रष्टाचार की जानकारी होने का दावा, राहुल गांधी के ये बयान इसी धारणा को मजबूत कर रहे हैं कि वे बिना सोचे-समझे बोलते हैं और इस क्रम में इसकी परवाह नहीं करते कि कहीं इससे खुद उनका ही उपहास तो नहीं उड़ेगा।

राहुल का ताजा बयान प्रधानमंत्री पर बड़ा राजनीतिक हमला कम, हास्यास्पद हमला अधिक है। अगर उनके पास प्रधानमंत्री के कथित भ्रष्टाचार के बारे में कोई जानकारी है तो आखिर वह उसे संसद में ही क्यों बताना चाहते हैं? क्या लोकसभा कोई अदालत है जहां उनका बयान गवाही की शक्ल ले लेगा? यह तो सबको पता है कि किसी विधानमंडल में उसके सदस्य को कुछ भी कहने की स्वतंत्रता है, लेकिन राहुल यह साबित करने की बेजा कोशिश कर रहे हैं कि विधायी सदन में कही गई कोई बात अकाट्य प्रमाण में तब्दील हो जाती है। जब ऐसा कुछ नहीं है तब फिर बेवजह की सनसनी का क्या मतलब? आखिर वह संसद परिसर में या फिर अपने दफ्तर में या अन्यत्र कहीं, वह सब कुछ क्यों नहीं कह देते जो कहना चाह रहे हैं और जिससे प्रधानमंत्री मुसीबत में पड़ जाएंगे? बेहतर हो कि वह बेतुके बयानों से अपनी जगहंसाई कराने के बजाय अपने ही दल के उन नेताओं से कुछ सीखें जिन्होंने बीते दिवस ही मीडिया को बुलाकर केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू के कथित भ्रष्टाचार की जानकारी दी थी। जो काम किसी केंद्रीय मंत्री पर आरोप लगाने के मामले में हो सकता है, वह प्रधानमंत्री के मामले में क्यों नहीं हो सकता?

राहुल गांधी ने एक सप्ताह के अंदर दूसरी बार यह बयान दिया है कि उन्हें संसद में बोलने से रोका जा रहा है। जब यह साफ है कि विपक्ष बहस से भाग रहा है, तब राहुल के बार-बार यह कहने का कोई मतलब नहीं कि उन्हें संसद में बोलने नहीं दिया जा रहा है। अगर विपक्ष सचमुच संसद चलने देने के लिए आतुर है तो वह तरह-तरह के बहाने बनाने और नारेबाजी करने में अपनी ऊर्जा क्यों खपा रहा है? यदि यह मान भी लिया जाए कि लोकसभा में बहस की नौबत इसलिए नहीं आ रही कि सत्तापक्ष मत विभाजन वाले नियम के तहत चर्चा को तैयार नहीं, तो भी क्या कारण है कि राज्यसभा चलने का नाम नहीं ले रही है? सभी इससे अवगत हैं कि राज्यसभा में नोटबंदी को लेकर चर्चा शुरू हो गई थी, लेकिन एक दिन बाद विपक्ष बहस से बचने के जतन करने में मशगूल हो गया। उसने पहले मांग की कि प्रधानमंत्री जवाब दें। इसके बाद उनके बहस में शामिल होने की मांग की गई। जब ये मांगें पूरी हो गईं तो हंगामा करने के नए बहाने खोज लिए गए। क्या ऐसा इसीलिए किया गया, क्योंकि कांग्र्रेस समेत विपक्षी दलों को यह समझ आ गया है कि जनता का एक बड़ा वर्ग तमाम परेशानी के बावजूद नोटबंदी का समर्थन कर रहा है? विपक्ष चाहे जैसे दावे करे, जनता अच्छे से जान रही है कि उसकी दिलचस्पी संसद को न चलने देने में है।

( साभार दैनिक भास्कर)