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दिल्ली में एक निर्भया-कांड और ! और उसी दिन जिस दिन चार साल पहले वह हुआ था। १६ दिसंबर को निर्भया-कांड की कटु-स्मृति में जब जंतर-मंतर पर सभा चल रही थी, उस समय मोतीबाग में हुए दूसरे निर्भया-कांड के मुजरिम को पुलिस पकड़ने में जुटी हुई थी।

एक निजी कार के डड्ढाइवर को पुलिस ने १२ घंटे में ही पकड़ लिया। इस डड्ढाइवर ने १५ दिसंबर की रात को २० साल की एक लड़की को अपनी कार में लिफ्ट दे दी और उसे उसके घर नोएडा छोड़ने के लिए चल पड़ा। तीन-चार घंटे उसे इधर-उधर घुमाने के बाद उसने उसके साथ मोतीबाग के एक सुनसान इलाके में बलात्कार किया।

बलात्कारी डड्ढाइवर अश्विन लघु-शंका करने गया तो यह लड़की भाग खड़ी हुई और थोड़ी देर में पुलिस तक पहुंच गई। पुलिस ने बड़ी मुस्तैदी दिखाई। लड़की की डाक्टरी जांच करवाई और उस डड्ढाइवर की कार, कार के मालिक और उस भगोड़े डड्ढाइवर को भी धर दबोचा। लेकिन क्या उस लड़की को कोई न्याय मिलेगा? नहीं। मुझे तो कोई उम्मीद नहीं है। निर्भया को मरे चार साल हो गए, उसके बलात्कारी हत्यारे अभी तक सरकारी मेहमान बने हुए हैं। उन्हें फांसी पर क्यों नहीं लटकाया गया? यदि अब या चार साल बाद लटकाया जाए तो भी उससे फायदा क्या? जान स्टुअर्ट मिल ने क्या खूब कहा था कि देर से दिया गया न्याय तो अन्याय ही है। ऐसे बलात्कारियों और नृशंस हत्यारों को जो सरकार बर्दाश्त करती है, उसे कान पकड़कर निकाल बाहर करना चाहिए और जो सजा देने में देर करते हैं, उन जजों को तुरंत बर्खास्त किया जाना चाहिए। बलात्कारियों को मौत की सजा जेल के बंद कमरों में नहीं, बल्कि चांदनी चौक और कनाट प्लेस जैसी जगहों पर दी जानी चाहिए ताकि भावी बलात्कारियों की हड्डियों में कंपकंपी दौड़ जाए।