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उत्तर भारत में लोगों को अकाल मृत्यु से बचाने के लिए सरकार को वहां बढ़ते वायु प्रदूषण से निपटने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।

हालात ऐसे हैं कि राजस्थान में जोधपुर से लेकर, बिहार में मुजफ्फरपुर तक जहाँं भी नज़र डालें साफ हवा विलुप्ति की कगार पर है। इन राज्यों में रहने वाले लोगों ने अक्टूबर-नवंबर के बीच अपना दो-तिहाई समय सरकारी नियमों के पैमाने के अनुसार बीमार कर देने वाली हवा में सांस लेकर बिताया है। आइए, देखें कि यह कितना खतरनाक है।

वैज्ञानिकों के हिसाब से, हवा में पीएम २.५ के कणों की संख्या के ज़्यादा होने पर छोटे बच्चों के मरने की संख्या में बढ़ोतरी देखी जा सकती है। इन कणों से बड़ों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर होता है। हवा में छोटे कणों की संख्या समाज में सांस और दमे की बीमारियों के बढ़ते मामलों के लिए भी जिम्मेदार है। भारत में हर साल पांच साल से कम उम्र में मरने वाले बच्चों में करीब २० प्रतिशत बच्चे गंदी हवा से होने वाले श्वास नली के संक्रमण से निमोनिया जैसी खतरनाक बीमारी के कारण मरते हैं। इसके अलावा दिल के दौरे से मरने वाले वयस्क लोगों की संख्या भी कम नहीं है।

वैज्ञानिकों की माने तो बढ़ते प्रदूषण और दिल के मरीजों की बढ़ती मृत्यु-दर में सीधा संबंध है। उन दिनों में जब प्रदूषण ज़्यादा होता है, तब उत्तर भारत के कई परिवारों में बच्चे और दिल के मरीजों की अकाल मृत्यु होती है। लोगों को लगता है कि ज़हरीली हवा की समस्या सिर्फ बड़े शहरों तक ही सीमित है पर सच यह है कि उत्तर भारत के ग्रामीण क्षेत्र भी इससे अछूते नहीं है। पिछले साल फरवरी के महीने में जब हमने उत्तरप्रदेश के सीतापुर जिले के कुछ गांवों में हवा को जांचा तो वहां भी हमें सरकारी नियमों से करीब आठ गुना बदतर हवा मिली।

उत्तर भारत में अब तक प्रदूषण की धुंध में लाखों जिंदगियां खो चुकी हंै और जल्द ही अगर इसके लिए कुछ ठोस कदम नहीं उठाए गए तो प्रदूषम कई करोड़ जानें और निगल जाएगा। आज जरूरत है कि सरकार, वैज्ञानिक और आम लोग एकजुट होकर काल के इस दूत के खिलाफ जंग छेड़ें।                 लवी पंत, २४ हेल्थ रिसर्चर, विश्व बैंक व डेमोग्राफी जैसे संस्थानों के लिए काम किया है।