Offcanvas Info

Assign modules on offcanvas module position to make them visible in the sidebar.

A A A

छवि गुप्ता गुजर गयीं, यह खबर फोन पर विश्वजीत ने मुझे दिया।

विश्वजीत आजकल शांतिनिकेतन में रहता है। हाल ही में शायद यहाँ आया होगा। मैं प्रायः दस महिने शिलचर से दूर था, इसलिए छविदी के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी। जानता था कि छवि दी डॉ. लक्ष्मणदास जी की निगरानी में श्रीकोना कल्याणी अस्पताल में रहती है। छवि गुप्ता घाटी के साहित्य जगत मे एक आंदोलन का नाम है, अगर कहा जाय तो अधिक नहीं होगा। प्रायः पांच दशक से छवि गुप्ता, साहित्य-सर्जन, नवीन लेखक-लेखिकाओं को उत्साह और प्रेरणा प्रदान कर रही हैं, साहित्यकारों को संगठित कर एक सुंदर वातावरण बनाने के लिए तन-मन-धन से समर्पित रही हैं। अपने तारापुर के गुप्त-कुटीर में हर माह ‘मासिक-साहित्य-वासरङ्क का आयोजन करती थी। उसमें उस समय के अधिकांश ख्यात एवं अख्यात, नवीन एवं प्रवीण कवि-साहित्यकार भाग लेते थे। छवि दी सभी से प्रसन्न मुद्दा में  बात करती थी, आदर-सत्कार करती थी। उनके पति मनोरंजन गुप्त जी भी अपनी पत्नी का पूर्ण रूप से सहयोग करते थे। साहित्यवासर में कविता, कहानी, आलोचना, निबन्ध आदि के अलावा तरह-तरह की हँसी-फूर्ति, मन की बातें एवं चुटकुले भी प्रस्तुत किये जाते थे एवं मधुर, प्रसन्न तथा प्रेमपूर्वक वातावरण की सृष्टि होती थी। वहाँ की खट्टी-मीठीे अनेक स्मृतियाँ आज भी कभी-कभी मेरे मन में जागती रहती हैं। 

छवि गुप्ता बचपन से ही साहित्य सृष्टि करती आयी थी, उनकी यह एक आदत हो गयी थी। एक सम्पन्न संस्कृति एवं उच्चशिक्षित परिवार की लाडली ल‹डकी थी। उनके सभी भाई जीवन में प्रतिष्ठित एवं सम्मानित जीवन व्यतीत करते थे। छवि दी पहले बचपन में अंग्रेजी भाषा में कविता लिखती थीं, साथ ही साथ बांग्ला भाषा में भी चर्चा करती थी।

छवि गुप्ता का वैवाहिक जीवन चाय बागानों में व्यतीत हुआ था क्योंकि उनका स्वामी मनोरंजन गुप्त उन बागानों में प्रबंधक हुआ करते थे। उन दिनों अंग्रेज प्रबंधक उनकी पत्नियाँ और संतानों को लेकर जैसे सांस्कृतिक आयोजन करती थी, उसी तरह चाय बागान के श्रमिक संगठनों को भी आनन्द और उत्साह प्रदान करने हेतु नाना प्रकार के पर्व और त्यौहारों में भाग लिया करती थीं। उनके हृदय में ममता की एक लहर सदा सक्रिय रहती थी।मनोरंजन गुप्ता जी के अवकाश ग्रहण के बाद, छवि गुप्ता जब पति के साथ शिलचर तारापुर आयी तो तुरंत वे बच्चों को लेकर एक संस्था बनायीं। जिसमें छोटे-छोटे बच्चों को अनुप्रेरित कर अभिनय, आवृत्ति इत्यादि का प्रशिक्षण देने में वे व्यस्त हो गयी। आर्य संस्कृत बोधिनी उन्हीं का अवदान है। ‘गल्पवालाङ्क उनका एक बाल कहानी संग्रह बहुत ही रोचक पुस्तक थी, ऐसा बहुतों से सुना है। आकाशवाणी में भी उनके रचित नाटक आदि प्रसारित हुए हैं। उन्होेंने गीत भी लिखा था जो आकाशवाणी में प्रसारित होता था।

उनके साथ मेरी बहुत सारी खट्टी-मीठी स्मृतियाँ  जु‹डी हुई हैं। एकबार एक बांग्ला पत्रिका के साहित्य विभाग में छवि गुप्ता पर मैंने एक मंतव्य लिखा, जिससे वे क्षुब्ध होकर तीव्र प्रतिक्रिया के साथ एक चिट्ठी लिखीं थी। मैं भी अपना जवाब दिया था। पर इससे हम दोनों के भीतर कोई विद्वेष नहीं पनपा। वरन् मैं यह कह सकता हूँ कि छवि गुप्ता के बारे में (उनकी कवितादि के बारे में ) अनेक आलोचना आदि स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में बंगला भाषा में प्रकाश करता रहा। उन दिनों मैं और अन्नपूर्णाजी (मेरी धर्मपत्नी) ‘झाँकीङ्क नाम से एक सामयिकी प्रकाश करते थे, जिनमें छवि गुप्ता की कविता का असमिया अनुवाद हम दोनों ने किया था। सिवाय इसके ‘बालार्कङ्क पत्रिका में छवि दी की अनेकों कविताएँ प्रकाशित हुई थी। यहाँ से पहले कई हिन्दी अनुवाद संकलन (बंगला में) प्रकाशित किये गये हैं, प्रातः सभी में छवि गुप्ता की कविता रहती थी। 

मेरे साथ और मेरी पत्नी के साथ छवि दी का बहुत ही घनिष्ठ आंतरिक और मधुर सम्पर्क था। अम्बिकापट्टी के फ्लैट में जब गयी तो उनके यहाँ यदा-कदा सपत्नीक जाया करता था। शारीरिक रुप से अश्वस्थ होने पर भी छवि दी चाय के साथ कुछ न कुछ खिलाती पिलाती थीं। खाली मुंह कभी नहीं छो‹डती थीं। 

दीपाली दत्त चौधरी जब छवि दी को उनके कमरे में अत्यन्त गंभीर हालत में देखीं तो लोगों को बुलवाकर अस्पताल भेजी थी। बाद में कई संस्था उनकी सहायता में आगे ब‹ढकर आये थे। मिता दास पुरकायस्थ के साथ मैं भी अपनी कुछ सहायता राशि भेजा था। गनीमत यह है कि डॉ. लक्ष्मण दास जैसा महान समाजसेवी डॉक्टर चिकित्सालय कल्याणी उन्हें आश्रय दिया, वहीं उनका देहान्त भी हो गया। 

दूसरे ही दिन श्यामा दास भट्टाचार्य जी की मृत्यु वहीं हुई। यह खबर मुझे अभिनव सिकदार महोदय ने दिया था। वह भी इस क्षेत्र के सांस्कृतिक जगत के एक प्रसिद्ध व्यक्ति थे। आज मैं छवि गुप्ता एवं श्यामा दास भट्टाचार्य की आत्मा की शांति के लिए सर्वशक्तिमान ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ।