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ेप्र.सं.हाइलाकान्दी, २० अक्टूबर : आज सुबह १० बजे से शायं ५ बजे तक केशव स्मारक संस्कृति सुरभि के प्रयास से कृषि विज्ञान केन्द्र हाइलाकान्दी में एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित हुई।

कार्यशाला के उद्घाटन में बोलते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के संयुक्त निदेशक डॉ. एस.बी. qसह ने कहा कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के तत्वावधान में पूरे देश में ५९० कृषि विज्ञान केन्द्र कार्यरत हैं। जिसमें ६० हजार वैज्ञानिक कृषि पर शोध कर रहे हैं। पूरी दुनिया में सबसे ब‹डा कृषि अनुसंधान संस्थान है आई.सी.आर.ए. (भा.कृ.अ.प.)। हमारा देश अस्सी प्रतिशत कृषि पर निर्भर है। मोदी सरकार कृषि के विकास के लिए बहुत प्रयास कर रही है, अगर ये प्रयास किसानों तक न पहुँचे तो इसका कोई फायदा नहीं। इसलिए हम सभी प्रयासरत हैं कि कृषि, पशु, मिट्टी, बीमारी आदि के बारे में हमारे वैज्ञानिक कृषकों को प्रशिक्षित कर सकते हैं। गांव-गांव जाकर हम डेमोस्ट्रेशन भी देते हैं ताकि प्रत्यक्ष जानकारी भी प्राप्त हो, और कृषक केवल थ्योरी नहीं प्रयोग भी देश सके। 

कार्यशाला में केशव स्मारक संस्कृति सुरभि के उपाध्यक्षद्वय चंद्रमा प्रसाद कोइरी, निरेन्द्र भट्टाचार्य, सहसचिव अभिजीत विश्वास, सचिव दिलीप कुमार, वरिष्ठ कार्यकर्ता ज्योत्सनामय चक्रवर्ती, कृपानारायण राय, आसु देवनाथ, राधाकृष्णन व ग्राम विकास प्रमुख रामव्रत नुनिया पूरे समय उपस्थित थे। कार्यशाला के प्रारंभ में केन्द्र के प्रमुख मो. अजिजुर रहमान ने कृषि विज्ञान केन्द्र के बारे में जानकारी दी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पं्रात सेवा प्रमुख दिनेश तिवारी ने कहा कि सरकार केबी के व समाज के बीच केशव स्मारक संस्कृति सुरभि सेतु का काम करेगी। यहाँ बहुत सारी जानकारियाँ हैं, जो कृषकों तक पहुँचाना आवश्यक है। संस्थान के प्लान्ट बीqडग विशेषज्ञ अभिषेक कुमार ने दलहन-तिलहन के खेती के बारे में किसानों को जानकारी प्रदान की। उन्होंने कहा कि यहाँ जो परम्परागत धान के बीज लगाये जाते हैं, उन्हें तैयार होने में १५० से १६० दिन लग जाते हैं। तब तक रबि फसल का समय निकल जाता है, इसलिए ऐसा धान लगाना चाहिए, जो १२० से १३० दिन में  हो जाय। और १५ नवंबर तक धान कट जाए, फिर रवि फसल कर सकते हैं। सरसों की खेती, अरहर दाल की खेती, मकई, मटर, मसूर, राजमा की खेती भी कर सकते हैं। उन्होंने बीज को सुरक्षित रखने के लिए सावधानियाँ भी बतायी। खाद विशेषज्ञ दीपक मिश्रा ने कहा कि यहाँ समस्या ये है कि एक बार पौधा लगाकर लोग भूल जाते हैं, उसकी qसचाई, खाद, कीटनाशक नहीं दिये जाने से उत्पादन कम हो जाता है। नवंबर से फरवरी चार महीने बारिश नहीं होती, उस समय पौधों को पानी और खाद की जरुरत होती है, बीमारी से बचाने के लिए कीटनाशक की जरुरत होती है, देर से सब्जी और फल का बीज डालने से बाजार में सही मूल्य नहीं मिलता। पौधा संरक्षण विशेषज्ञ सौरभ शर्मा  वर्मि कम्पोस्ट प्रोडक्शन मशरुम, मधुमक्खी पालन की जानकारी दी। पशुपालन विशेषज्ञ बंकित कुपरमुखीन ने मत्स्य पालन व मुर्गी पालन के बारे में बताया। उपकरण विशेषज्ञ के.तायल संजीवा ने खेती में प्रयोग होने वाले अत्याधुनिक यंत्रों व तकनीकी के बारे में जानकारी दी। अनुभव कथन में बोलते हुए संस्कृति सुरभि के सचिव दिलीप कुमार ने   भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद व कृषि विज्ञान केन्द्र के प्रति आभार प्रकट करते हुए कहा कि यहाँ चल रहे शोध की जानकारी, गांव गांव में किसानों को पहुँचानी चाहिए। गांव-गांव से शिक्षित कृषकों को प्रशिक्षित करके कृषि के माध्यम से गांव के अर्थ विकास को मजबूत बनाना चाहिए। आज जो जानकारियाँ मिली हैं वो बराकघाटी के किसानों के लिए दुर्लभ है। किन्तु एक दिन से कुछ नहीं होगा, इसके लिए सतत प्रशिक्षण की जरुरत है। 

कार्यशाला में २५ किसानों को बीज प्रदान किया गया। धन्यवाद ज्ञापन प्रोग्राम कोआर्डिनेटर अजिजुर्रहमान ने किया। कार्यशाला के पश्चात कृषि विज्ञान केन्द् द्वारा किये जा रहे विभिन्न प्रयोगों को दिखाया गया। जिसमें धान खेती, जल संग्रह, मिर्चा, बैंगन आदि के पौधों का बीजीट कराया गया। पशुपालन केन्द्र भी दिखाया गया। पिछले तीन साल में ही कृषि विज्ञान केन्द्र में काफी उन्नति की है। कार्यशाला में कुल ४६ कृषकों ने भाग लिया।