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प्रेरणा भारती को दैनिक चलाने की चुनौती व १७ साल की यात्रा · दिलीप कुमार

चैत्र पूर्णिमा संवत् २०५५ तद्नुसार अप्रैल १९९८ से प्रारंभ हुयी प्रेरणा भारती की यात्रा आज यहाँ तक पहुँची है। हमारे समक्ष अब तक कि सबसे ब‹डी चुनौती है, इसे दैनिक के रूप में चलाने की। जब हमलोगों ने प्रेरणा भारती का शुभारम्भ किया था, उस समय हिन्दी साहित्य के नाम पर शिलचर में एकमात्र व्यक्ति थे, माननीय श्री अशोक वर्मा जो एकल प्रयास से बालार्क प्रकाशन द्वारा जब तब हिन्दी पुस्तकें प्रकाशित करते रहते थे। इसके पूर्व भी कई प्रयास हुए और प्रेरणा भारती शुरु होने के बाद भी कई प्रयास हुए और प्रेरणा भारती शुरु होने के बाद भी कई प्रयास हुए किन्तु अभी तक बराकघाटी में लाखें हिन्दीभाषी होने के बावजूद कोई दैनिक समाचार पत्र सफल नहीं हो सका। स्व. विश्वनाथ उपाध्याय, स्व. दत्तात्रेय मिश्र, डॉ. अंजनी कुमार दुबे, लॉ. लक्ष्मी निवास कलवार, श्री मदन qसघल, युगल किशोर त्रिपाठी आदि कई नाम हैं जिन लोगों ने हिन्दी प्रचलन के लिए विभिन्न प्रकार से प्रयास किये हैं। यदि ये कहा जाय कि इन सब महानुभावों के प्रयास से निर्मित वातावरण के बल पर ही प्रेरणा भारती का शुभारम्भ हुआ।

प्रेरणा भारती के संचालन के लिए १९९८ में समिति भी गठित की गयी थी। बराक हिन्दी साहित्य समिति के माध्यम से एक वर्ष साहित्यिक पत्रिका के रूप में प्रेरणा भारती प्रकाशित हुई। पत्रिका के तीन अंक शिलचर से व चार अंक पटना से छपाए गए किन्तु पत्रिका के लिए आवश्यक धनराशि के अभाव में एक वर्ष पश्चात ही बंद कर देना प‹डा। तब मैं स्वयं पत्रिका वितरण भी किया करता था। पत्रिका के बंद हुए ४ वर्ष हुए थे कि २००३ में ब्रह्मपुत्र उपत्यका में हिन्दीभाषियों पर हुए अत्याचार, उत्पी‹डन के बाद लोगों का आग्रह हुआ कि एक हिन्दी समाचार पत्र होना चाहिए। ऐसे में प्रसिद्ध उद्योगपति समाजसेवी माननीय रामअवतार अग्रवाल, बराक हिन्दी साहित्य समिति, ईटभट्टा एसोशिएशन सहित अनेकों हिन्दीभाषी समाजसेवियों ने प्रेरणा भारती को समाचार पत्र के रूप में प्रारम्भ करने का आग्रह किया। तब हमने अपने निकटस्थ मित्रों, शुभqचतकों से परामर्श कर प्रेरणा भारती को हिन्दी दिवस २००३ से यात्रा शुरु हुयी। बराक हिन्दी साहित्य समिति ने प्रेरणा भारती को चलाने की जिम्मेदारी मेरे ऊपर सौंपी। मैंने भी अन्य दायित्वों से मुक्ति लेकर अपना पूरा ध्यान प्रेरणा भारती पर लगाया। इस बार मेरे साथ सहयोग के लिए प्रस्तुत थी, हमारी अद्र्धांगिनी सीमा जी। साथ ही उधारबंद से श्री चंद्रमा प्रसाद कोइरी, लखीपुर से सुनील कुमार qसह, पाथरकान्दी से दासी ग्वाला, दुल्र्लभछो‹डा से दिवाकर राय, शिलचर में भी कई लोग सहयोग में सक्रिय हुए। देखते देखते प्रेरणा भारती सात महीने में पत्रिका आकार से डबल और मासिक से पाक्षिक हो गयी। २००४ के अप्रैल से २००५ अप्रैल तक पाक्षिक चलने के पश्चात् गायत्री परिवार से जु‹डे (बीआरटीएफ के अधिकारी) जितेन्द्र कुमार द्विवेदी की प्रेरणा से पत्रिका साप्ताहिक हो गयी।

साप्ताहिक होने के बाद प्रेरणा भारती के सम्मुख अ‹डचनें ब‹ढने लगी। जब कोई भी संवेदनशील विषय आता मुद्रक (qप्रqटग प्रेस) पत्रिका छापने में आनाकानी करते थे। उसी समय बराक चाय उद्योग के उज्ज्वल नक्षत्र माननीय कमलेश qसहजी ने परामर्श दिया, अपना मुद्रणालय स्थापित करने का। इसके लिए लाखों रुपये की जरुरत थी, बैंक से लोन लेने के लिए हमारे पास कुछ भी नहीं था। न जमीन थी, न फिक्स डिपाजीट, न जीवन बीमा पॉलिसी और न ही नगद । ऐसे में विशाल हृदय के स्वामी बीएसएनएल के रिटायर्ड अधिकारी माननीय रामकुमार मल्लाह, मा. अशोक वर्मा व कुछ  मित्रों ने सहयोग का हाथ ब‹ढाया और जमानतदार बन गये, बैंक से ऋण लेकर २००८ फरवरी में अपने मुद्रणालय से प्रेरणा भारती की यात्रा शुरु हुयी।

हम लोग किराए के मकान में रहते थे, अक्सर हमारे यहाँ आने-जाने वालों की अधिकता से परेशान होकर मकान मालिक हमें घर छो‹डने को बाध्य करते थे। ये सिलसिला २००३ में पेपर के फिर से शुरु करने के बाद से २००८ तक चलता रहा। २००८ में हमने लिखित समझौता करके अपना मुद्रणालय प्रारम्भ किया। मुद्रणालय को मेहरपुर में सुरु करने में बहुत बाधा भी डाली गयी। वर्ष २००९ में माननीय रामकुमार मल्लाह के कनिष्ठ पुत्र राजेश मल्लाह ने प्रेरणा भारती वेबसाइट निर्माण किया। २००९ से इण्टरनेट संस्करण प्रारम्भ हो गया। एक साल बीतते न बीतते मकान मालिक कमरा खाली करने का दबाव डालने लगे। अब प्रश्न ये ख‹डा हुआ कि प्रेस को एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाना एक ब‹डा काम था, जो बार-बार संभव नहीं था। एक बार फिर माननीय कमलेश qसहजी ने सुझाव दिया कि आजीवन पाठक बनाकर, उस राशि से अपना कार्यालय निर्माण करने के लिए। २०११ में प्रयास प्रारम्भ हुआ। कटहल रोड में जमीन खरीदी गयी। एक सौ से ज्यादा पाठकों के सहयोग राशि के बलपर जमीन खरीदी गयी। जमीन होने पर बैंक से गृह निर्माण हेतु ऋण भी मिल गया। २०१२ फरवरी में कार्यालय भवन निर्माण प्रारम्भ हुआ और २०१३ जनवरी में श्रीराम महायज्ञ के पूर्व प्रेरणा भारती का कार्यालय व मुद्रणालय निजी भवन में स्थानान्तरित हो गया। निजी भवन में आने के पूर्व ही प्रेरणा भारती को दैनिक करने का विचार भी प्रारम्भ हो गया था।

जिस शिलचर में हिन्दी समाचार पत्र कौन प‹ढेगा, कहा जाता था, वही अब इसे दैनिक रुप देने की चर्चा प्रारम्भ हो गयी। पाठकगण, शुभqचतक गण दैनिक हेतु दबाव देने लगे। एक नवयुवक राजेन कुँवर ने आगे ब‹ढकर इसके लिए पचास हजार रुपये भी प्रदान किया। दो वर्ष के qचतन-मनन के पश्चात हम लोगों ने इसे १३ फरवरी २०१६ से दैनिक के रूप में प्रकाशित करने का निर्णय लिया जो आगे ब‹ढकर ७ मार्च २०१६ हो गया। अब ये लेख प‹ढते समय प्रेरणा भारती आपके हाथ में दैनिक के रूप में होगी।

तो क्या निर्णय लेने या शुरु कर देने से प्रेरणा भारती दैनिक प्रकाशित होने लगेगी? जी नहीं अभी हमें इसके लिए काफी पाप‹ड बेलने हैं। हमारे सामने सबसे ब‹डी समस्या पूँजी की है, जिसके लिए हम पिछले कई महीने से पाठकों से अपील कर रहे हैं। कुछ पाठक और शुभqचतक सक्रिय भी हुए हैं किन्तु यह पर्याप्त नहीं है। इसके लिए बराकघाटी के हर चाय बागान, हर गाँव, हर नगर में लोगों को सक्रिय करना होगा। पाठक जुटाने प‹डेंगे, विज्ञापन चाहिए, पत्रिका के लिए समाचार साहित्य भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराना होगा। जो आप सभी के सहयोग के बिना असंभव है। मैं अपने सभी सहयोगियों, शुभqचतकों के प्रति अब तक किये गये सहयोग के लिए आभार व्यक्त करता हूँ साथ ही इसे दैनिक प्रकाशित करने के लिए आवश्यक आर्थिक व साहित्यिक सहयोग हेतु विनम्र अनुरोध करता हूँ। मुझे पूर्ण विश्वास है कि ये यात्रा भी सफल होगी।