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नयी दिल्ली,(समा.एजें) ४ जनवरी : भारतीय निर्वाचन आयोग ने बुधवार (चार जनवरी) को पांच राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनावों के तारीखों की घोषणा की। चार फरवरी से आठ मार्च के बीच उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में विधान सभा चुनाव होंगे।

चुनाव के नतीजे ११ मार्च को आएंगे। मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम जैदी ने बताया कि चार फरवरी को पंजाब और गोवा में एक चरण में मतदान होगा। उत्तराखंड में १५ फरवरी को एक चरण में मतदान होगा। मणिपुर में दो चरणों में चार मार्च और आठ मार्च को मतदान होगा। उत्तर प्रदेश में ११ फरवरी से आठ मार्च के बीच सात चरणों में मतदान होगा। चुनाव की तारीखों की घोषणा के साथ ही इन सभी राज्यों में चुनावी आचार संहिता लागू हो गयी है। इन राज्यों में चुनाव के दौरान भ्रष्टाचार, विकास, बेरोजगारी, नशाखोरी, किसानों की बदहाली, जातीय समीकरण, धार्मिक ध्रुवीकरण, पर्यावरण, सामुदायिक पहचान, भाषायी पहचान और पूर्वोत्तर आफ्सपा और बंद-हड़ताल अहम मुद्दे होंगे।

उत्तर प्रदेश- देश की राजनीति में उत्तर प्रदेश (यूपी) का दबदबा इसी से जाहिर है कि भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत आधा दर्जन से अधिक पीएम यहीं से सांसद रहे हैं।  यूपी के सीएम को भारत के पीएम के बाद देश का दूसरे सबसे ताकतवर राजनीतिक शख्स माना जाता है। ऐसे में यूपी विधान सभा चुनाव के नतीजे न केवल प्रदेश बल्कि देश की राजनीति पर असर दिखाते हैं। राज्य में मुख्य मुकाबला बहुजन समाज पार्टी (बसपा), समाजवादी पार्टी (सपा) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच माना जा रहा है। आगामी विधान सभा चुनाव में ऊपरी तौर पर विकास और भ्रष्टाचार सबसे प्रमुख मुद्दे रहेंगे। पीएम मोदी और यूपी के सीएम अखिलेश यादव दोनों ही खुद को ‘विकास पुरुषङ्क के रूप में पेश करते रहे हैं। लेकिन अंदरखाने जातीय समीकरण और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण यूपी चुनाव में प्रभावी साबित होंगे। सपा और बसपा के बीच मुसलमानों के लिए लगी होड़ और भाजपा द्वारा खुद को ‘हिन्दू धर्म रक्षकङ्क के रूप में पेश किया जाना इसकी तरफ साफ इशारा करते हैं। सपा, बसपा और भाजपा तीनों ही चुनाव के लिए जातीय अस्मिता का कार्ड खेल रहे हैं।पंजाब- भ्रष्टाचार, विकास और बेरोजगारी जैसे एवरग्रीन मुद्दों के अलावा पंजाब चुनाव में नशाखोरी प्रमुख मुद्दा रहेगा। पंजाब में नशे की समस्या पर उड़ता पंजाब जैसी फिल्म बनने के बाद ये मुद्दे पहले से भी ज्यादा गर्म हो गया। राज्य में अकाली दल और भाजपा की गठंधन सरकार है। राज्य की राजनीति में अकाली-भाजपा और कांग्रेस के बीच के होने वाले मुकाबले को आम आदमी पार्टी की मौजूदगी ने त्रिकोणीय बना दिया है।

उत्तराखंड- उत्तराखंड चुनाव में कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने होंगी। उत्तराखंड की मौजूदा कांग्रेस सरकार अंदरूनी कलह की शिकार है। पिछले साल पार्टी के दो फाड़ हो जाने से सरकार सुप्रीम कोर्ट की मदद से गिरने से बची। राज्य के मौजूदा सीएम हरीश रावत के पैसे लेकर बागी विधायकों को खरीदने के कथित वीडियो के सामने आने के बाद आगामी चुनाव में उनकी अग्निपरीक्षा होगी। औद्योगिक निर्माण के कारण पहाड़ी राज्य के पर्यावरण को हो रही क्षति और बढ़ती बेरोजगारी भ्रष्टाचार के अलावा बड़े मुद्दे हो सकते हैं। कांग्रेस की तरह बीजेपी भी अंदरूनी कलह की शिकार है भले ही वो सतर पर न दिखे। आपको याद ही होगा कि २०१२ के विधान सभा चुनाव में राज्य के तत्कालीन सीएम भुवन चंद्र खंडूरी पार्टी के सम्मानजनक प्रदर्शन के बावजूद अपनी सीट हार गए थे। तब ये माना गया था कि खंडूरी की हार में पार्टी के असंतुष्टों का हाथ था। उस चुनाव में राज्य की ७० विधान सीटों में से ३२ पर कांग्रेस को और ३१ पर भाजपा को जीत मिली थी।

मणिपुर- पूर्वोत्तर भारत के इस राज्य में आफ्सपा कानून एक बड़ा मुद्दा हो सकता है।। मणिपुर की सामाजिक कार्यकर्ता इरोम शर्मिला ने इस कानून को हटाने के लिए १६ साल लंबी भूख हड़ताल पिछले साल खत्म की। शर्मिला इस साल विधान सभा चुनाव में उतरने की भी घोषणा कर चुकी हैं। ऐसे में इस मुद्दे को तवज्जो मिलने पर किसी को हैरत नहीं होगी। राज्य में नगा और कुकी आदिवासियों के बीच संघर्ष भी एक बड़ा मुद्दा रहा है। राज्य में बार-बार होने वाले बंद और चक्काजाम भी आम जनता के लिए प्रमुख मुद्दे होंगे। गोवा- सैलानियों के पसंदीदा तटीय राज्य गोवा में पारंपरिक तौर पर भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला होता है लेकिन इस बार आम आदमी पार्टी मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की पुरजोर कोशिश कर रही है। गोवा के चुनाव में भ्रष्टाचार,  सामुदायिक पहचान और भाषायी पहचान बड़ा मुद्दा हो सकती है।